भनक व रंगमिथ के संयुक्त प्रयास से बच्चों ने मनवाया नाट्य क्षमता का लोहा

21 दिवसीय नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला का हुआ समापन

21 दिवसीय नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला का हुआ समापन पूर्णिया. भरत नाट्य कला केन्द्र और रंगमिथ पूर्णिया के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इक्कीस दिवसीय नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला का सोमवार को समापन हो गया. समापन समारोह के मौके पर स्थानीय टाउन हॉल में नाटक का प्रदर्शन भी किया गया. सर्वप्रथम वार्ड पार्षद कल्याणी राय, समाजसेवी राजीव राय उर्फ़ बबली राय, वरिष्ठ रंगकर्मी, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और भिखारी ठाकुर सम्मान से सम्मानित मिथिलेश राय, भिखारी ठाकुर सम्मान प्राप्त वरिष्ठ रंगकर्मी उमेश आदित्य और साहित्यकार गिरिजा नन्द मिश्रा ने कार्यक्रम का उद्घाटन संयुक्त रूप से किया. अपने संबोधन में समाजसेवी बबली राय ने कहा कि यह एक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप है. इस कार्यशाला में शामिल बच्चों ने काफी मेहनत की है. सभी बच्चे पहली बार रंगमंच पर आ रहे हैं. इसके लिए उन्होंने बच्चों के अभिभावकों को बधाई भी दी. कार्यशाला में तैयार नाटकों का हुआ मंचन समापन सत्र में इस कार्यशाला में तैयार चार नाटकों का भी मंचन किया गया जिनमें हास्य नाटक ओका-बोका-तीन चरौका, ब्लैकडॉग, सिरचन बियांड द सीन और सेकेंड हैंड किताब वाला शामिल रहा. हास्य नाटक ओका-बोका-तीन चरौका चार ऐसे लड़कों की कहानी है जो बहुत अच्छा करने के प्रयास में सब कुछ गड़बड़ कर देते हैं. शामिल कलाकारों में मोनिका कुमारी, खुशी कुमारी, वसु कुमारी, सोनाक्षी कुमारी, अन्नू कुमारी, आदित्य कुमार, ताहिरा मरियम, फरोग जानी, नीरज कुमार, आर्यन कुमार, इशिका कुमारी और शिवानी कुमारी ने अपने शानदार अभिनय से दर्शकों को खूब हंसाया. वहीं पात्रों के अनुकूल बेहतरीन वस्त्र विन्यास और रूप सज्जा ने नाटक के कथ्य को दर्शकों तक पहुंचाने में मदद की. ब्लैक डॉग का मंचन दूसरे नाटक ब्लैक डॉग में अभिनेता अभिनव आनंद ने अपने बेहद संवेदनशील अभिनय से दर्शकों को स्तब्ध कर दिया. अपनी मां की कैंसर बीमारी से विक्षुब्ध व्यक्ति उसकी पीड़ा नहीं देख पाता और अपने हाथों से उसका गला घोंटकर मुक्ति दे देता है. अपने जीवन की विडंबनाओं से तंग आकर वह खुद भी जीवित नहीं बचता. सिरचन बियांड द सीन में अभिनेता रजनीश आर्या मानो दीदी की विदाई के बाद अपने बारे में सोचता है कि लोग उसकी कला का सम्मान क्यों नहीं करते. वह क्यों उपेक्षा का शिकार है. वह निर्णय कर लेता है कि अब वह कारीगरी और कलाकारी नहीं करेगा, अब खेतों में जाएगा और मजदूरी करेगा. लेकिन मानो दीदी के लिए चिक और शीतलपाटी बनाते समय उसका दिल नहीं टूटा बल्कि सिरचन ही टूट गया है. चौथे नाटक सेकंड हैंड किताब वाला, फुटपाथ पर पुरानी किताबें बेचने वाले एक व्यक्ति की कहानी है जो सोचता है कि अब लोग उसकी किताबें क्यों नहीं खरीदते. सोशल मीडिया के इस भयावह दौर में किताबों की बिक्री को लेकर भारी सोच में डूब जाता है उसे अपने बच्चों, पत्नी और उनके भविष्य की चिंता खाए जा रही है. वह सोचता है कि क्या अब पुस्तकों की उपयोगिता नहीं रही. इनकी रही अहम भूमिका इन सभी नाटकों का लेखन, निर्देशन और वस्त्र विन्यास मिथुन कुमार ने किया. नाट्य निर्देशन व प्रकाश योजना में सहयोग अमित कुमार अंशु का रहा. जबकि ध्वनि संयोजन सुमन कुमार ने किया था. समारोह की सम्पूर्ण व्यवस्था में मिथिलेश राय, उमेश आदित्य, शशिकांत प्रसाद, रंगकर्मी मिथुन कुमार गुप्ता, रजनीश आर्या, दीपक कुमार, रामभजन, सुमन कुमार आदि ने अपना सक्रिय सहयोग दिया.

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Author: SATYENDRA SINHA

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