पूर्णिया में दो नदियों के बीच बसा आस्था का अद्भुत धाम, जानिए इस प्राचीन शिवधाम की अद्भुत कथा

Aaj ka Darshan: कोसी-सीमांचल से लेकर बंगाल और नेपाल तक लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बने बाबा वरुणेश्वर धाम की महिमा निराली है. मान्यता है कि जो श्रद्धालु अनायास भी यहां पहुंच जाते हैं, उन पर बाबा की विशेष कृपा बरसती है. यही वजह है कि सालभर इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है.

पूर्णिया के बीकोठी से अरविंद कुमार जायसवाल की रिपोर्ट

Aaj Ka Darshan: पूर्णिया जिले के बड़हरा कोठी प्रखंड में स्थित बाबा वरुणेश्वर स्थान कोसी-सीमांचल क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध शिवधामों में गिना जाता है. इस मंदिर की ख्याति केवल बिहार तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल और नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. बाबा के प्रति लोगों की अटूट आस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर दिन यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है.

मंदिर परिसर में बाबा वरुणेश्वर के अलावा मां काली, शिव गंगा भैरव, बजरंगबली, नंदी तथा राम-लखन-सीता के मंदिर भी स्थापित हैं. पूरे परिसर की देखरेख बाबा वरुणेश्वर स्थान विकास समिति द्वारा की जाती है.

जब गाय ने खोला स्वयंभू शिवलिंग का रहस्य

बाबा वरुणेश्वर धाम से जुड़ी सबसे चर्चित कथा यहां के स्वयंभू शिवलिंग की है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार बहुत पहले यह पूरा इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था. चरवाहे यहां अपनी गायों को चराने लाया करते थे. उन्हीं गायों में एक गाय प्रतिदिन झुंड से अलग होकर एक स्थान पर अपना दूध स्वतः गिरा देती थी.

जब चरवाहों को यह बात असामान्य लगी तो उन्होंने उस गाय पर नजर रखनी शुरू की. एक दिन जब उन्होंने उस स्थान की खुदाई की तो वहां शिवलिंग मिला. इसके बाद उस जगह पर एक छोटी झोपड़ी बनाकर पूजा शुरू की गई. समय के साथ यह स्थान श्रद्धा और आस्था का बड़ा केंद्र बन गया.

शिवरात्रि में उमड़ता है आस्था का सैलाब

बाबा वरुणेश्वर धाम में महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है. इस अवसर पर श्रद्धालु बटेश्वर स्थान से जल लेकर यहां पहुंचते हैं और बाबा का जलाभिषेक करते हैं. शिवरात्रि के पहले दिन से ही यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटने लगती है.

विशेष बात यह है कि यहां एक महीने तक विशाल मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से व्यापारी अपनी दुकानें लगाते हैं. धार्मिक आयोजन के साथ यह मेला स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन जाता है.

पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ी है मान्यता

स्थानीय लोगों के अनुसार इस धाम का संबंध महाभारत काल से भी माना जाता है. देवरी गांव निवासी अरुण कुमार झा बताते हैं कि बुजुर्गों के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां आकर पूजा-अर्चना करते थे. यह भी मान्यता है कि श्रृंगी ऋषि के भाई ने इस स्थान पर साधना की थी, जिसके बाद बाबा वरुणेश्वर धाम की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई.

दो नदियों के बीच स्थित यह पवित्र स्थल आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक शांति का केंद्र बना हुआ है.

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लेखक के बारे में

Published by: Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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