पूर्णिया : किसी जमाने में पूर्णिया को भले ही गरीबों का दार्जिलिंग कहा जाता हो पर अब वे दिन लद गये. पर्यावरण से लगातार छेड़छाड़ के कारण इसका मिजाज अब शुष्क हो चला है. वे दिन भी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रहे जब गर्मी के मौसम में भी पूर्णिया में लोगों को एक चादर ओढ़ने की विवशता बनी हुई थी. मौसम के शुष्क मिजाज के कारण अब गर्मी को झेलना मुश्किल साबित हो रहा है.
शुष्क हो चला है अब मिनी दार्जिलिंग पूर्णिया का मिजाज
पूर्णिया : किसी जमाने में पूर्णिया को भले ही गरीबों का दार्जिलिंग कहा जाता हो पर अब वे दिन लद गये. पर्यावरण से लगातार छेड़छाड़ के कारण इसका मिजाज अब शुष्क हो चला है. वे दिन भी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रहे जब गर्मी के मौसम में भी पूर्णिया में लोगों को एक […]

दरअसल, पिछले दो दशकों में पूर्णिया के मौसम में आश्चर्यजनक रूप से बदलाव आया है. पेड़-पौधो की अंधाधुंध कटाई और फैलते कंकरीट के जंगलों ने गरीबों के इस दार्जिलिंग के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है.
समझा जाता है कि पूर्णियावासियों को इस असंतुलन का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. वैसे, पूर्णिया के बुजुर्ग भी मानते हैं कि इस साल जैसी गर्मी पहले नहीं देखी. बुजुर्गवार बताते हैं कि पहले दिन में गर्मी होती थी तो शाम होते-होते बारिश हो जाती थी.
गौरतलब है कि आदिकाल से वन संपदा और हरियाली के रूप में पूर्णिया की पहचान रही है. ऐसा माना भी गया है कि पूर्ण अरण्य यानी पूरा जंगल के कारण ही इस जिले का नाम पूर्णिया हुआ. पर्यावरणविदों की मानें तो हरे भरे पेड़-पौधो के कारण पूर्णिया का मौसम हमेशा खुशगवार रहा है.
एक समय था जब जिधर जाइए उधर ही खुली हवा मानो प्रकृति ने पूर्णिया को अपनी गोद में बैठा रखा हो. अगर दिन में हल्की सी भी गर्मी पड़ी तो शाम तक झमाझम बारिश होना तय था. शायद यही वजह है कि लोग पूर्णिया को मिनी दार्जिलिंग अथवा गरीबों का दार्जिलिंग कहते आ रहे हैं .
दो दशकों से जारी है बदलाव का दौर :
मिनी दार्जिलिंग कहे जाने वाले पूर्णिया में पिछले दो दशकों से बदलाव का दौर जारी है. अगर देखा जाए तो पूर्णिया के मौसम में बदलाव का दौर सन 1999 के बाद शुरू हुआ. मौसम के जानकारों का कहना है कि वर्ष 2000 के बाद से मौसम की स्थिति तेजी से बदली है. जानकारों की मानें तो उस समय मई और जून में भी पूर्णिया का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से उपर नहीं भागता था.
इतने तापमान में यहां के लोगों को भीषण गर्मी का अहसास होता था पर उन्हें यह पता होता था कि शाम तक बारिश मौसम को ठंडक दे जाएगी. इससे लोगों को राहत भी मिलती थी. मगर पिछले कुछ सालों से पूर्णिया के मौसम का तेवर अप्रत्याशित रूप से बदलने लगा है जिससे लोग हैरान और परेशान हैं. आलम यह है कि आज के दौर में मौसम का पारा 40-42 डिग्री सेल्सियस पार करने लगा है.
शहरीकरण की होड़ से हो रहा नुकसान: मौसम के जानकारों का कहना है कि शहरीकरण की होड़ में पूर्णिया अब कंकरीट के जंगल में तब्दील हो गया है . इस होड़ में पेड़-पौधो की अंधाधुंध कटाई कर बड़ी बड़ी बिल्डिंग बनाने का सिलसिला यहां नब्बे के दशक के बाद से शुरू हुआ और उसी समय से धीरे धीरे मौसम में परिवर्तन की प्रक्रिया भी शुरू हुई.
आलम यह है कि पूर्णिया में जहां पेड़ लगे हुए थे वहां बहुमंजिली इमारतें खड़ी हैं. तीन साल पहले शहर में सिक्स लेन निर्माण के दौरान लाइन बाजार से खुश्कीबाग तक सड़क के दोनों तरफ लगे हुए सभी पुराने पेड़ काट दिए गए. नहरों के दोनों किनारों पर अब पेड़-पौधो का झुरमुट नजर नहीं आता. पर्यावरणविदों का कहना है कि पेड़-पौधो की अंधाधुंध कटाई के कारण पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा है जिससे मौसम प्रभावित हुआ है.