पूर्णिया : रिक्शा चालकों एवं गरीब मुसाफिरों के ठहरने के लिए प्रमंडलीय मुख्यालय के शहर में कोई व्यवस्था नहीं है. हालात यह है कि ये लोग रात में गरीब मजदूर एवं रिक्शा चालक सड़क किनारे दुकानों के फर्श पर खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर हैं. तात्पर्य यह कि रात होते ही शहर इन लोगों को बेगाना लगने लगता है. इस ओर किसी का ध्यान नहीं है.
शहर के गिरजा चौक स्थित रैन बसेरा दिन भर खुला एवं खाली और रात में यह स्टोर रूम बन जाता है. इसके अंदर आसपास के दुकानदारों के कुछ सामान रखे रहते हैं. बसेरा का गेट अंदर से बंद है और शौचालय की स्थिति शौच के लायक नहीं है. कहा जा सकता है कि अघोषित रूप से यह रैन बसेरा दुकानदारों के कब्जे में है.
यहां सामने दुकान लगती है और वही इसका उपभोग करते हैं. लाइन बाजार के सदर अस्पताल के निकट बने रैन बसेरा की स्थिति अन्य बसेरा से अच्छा जरूर दिखता है मगर यहां लोगों को रात गुजारने का मौका नहीं मिल पाता है.
पास के नाश्ते के दुकानदारों ने कहा कि वे ही रात में किसी तरह से इसमें रहते हैं. हालांकि यह रैन बसेरा भी दुकानदारों के लिए स्टोर रूम बना हुआ है. दूर-दूर तक पेयजल की सुविधा नहीं है. बसेरा के पास एक चापाकल भी नहीं है.
आस्था मंदिर के पास शहर का एकमात्र रैन बसेरा है, जहां लोगों को आश्रय मिल पा रहा है. ऐसा इसलिए कि यहां सोने के लिए फर्श पर फ्रेम बना हुआ है. साथ ही एक साथ कई रिक्शा चालक को रहने का मौका मिल जाता है.
यहां बाहर में फिट-फाट एवं चालू हालत में चापाकल भी हैं. कई रिक्शा चालक रैन बसेरा के बाहर खुद चूल्हा जला कर खाना पका लेते हैं. पूर्व में यहां 40 से 50 रिक्शा चालक रहते थे अभी यहां 15 से 20 की संख्या में रिक्शा चालक रह रहे हैं.
इच्छाशक्ति का है अभाव . इन समस्याओं को लेकर कई बार स्थानीय समाजसेवियों एवं स्वयंसेवी संस्थानों ने आवाज उठायी मगर नगर निगम ने इस बात को तवज्जों नहीं दी.
कहा जाता है कि इसमें जिम्मेदार अधिकारी एवं कर्मचारी ने कभी ध्यान नहीं दिया. ऐसा लगता है कि इस समस्या के देखरेख के लिए नगर निगम के पास कोई व्यवस्था नहीं है. इस विषय पर कोई बातचीत करने के लिए भी योजना नहीं बनती.
शहर में कोई सार्वजनिक भवन भी नहीं
उत्तरी बिहार का सबसे अधिक महत्वपूर्ण शहर पूर्णिया प्रमंडलीय मुख्यालय है. इस शहर में ऐसा कोई सार्वजनिक भवन अथवा धर्मशाला भी नहीं है जहां गरीबों, मजलूमों और यतीमों को पनाह मिल सके. हालांकि पूर्व में लाइन बाजार में धर्मशाला थी जो अब अस्तित्वहीन हो गया है.
अभी पूर्णिया में ऐसे कोई मंदिर, मस्जिद भी नहीं है जहां रात में लोग समय कटा सके. यहां बता दें कि शहर में सरकारी जमीन की कमी नहीं है. लेकिन प्रशासन ने ना तो उसकी खोज की और ना ही उस पर जनकल्याण की कोई योजना बनी.
