क्या दीपक प्रकाश को छोड़ना पड़ेगा मंत्री पद? 9वीं सीट पर चिराग ने उतारा उम्मीदवार, जानिए क्या है नियम

Bihar MLC Election: बिहार एमएलसी चुनाव के लिए NDA ने अपने सभी उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं, लेकिन पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को टिकट नहीं मिला. चूंकि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं. सवाल यह है कि क्या दीपक प्रकाश के लिए आगे कोई नया राजनीतिक रास्ता निकलेगा या उनको मंत्री पद छोड़ना पड़ेगा?

Bihar MLC Election: बिहार विधान परिषद की 9 सीटों पर होने वाले चुनाव के लिए एनडीए ने अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं. भाजपा और जदयू ने चार-चार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जबकि एक सीट पर लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने अशरफ अंसारी को उम्मीदवार बनाया है.

उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर हो रही है. इसकी वजह यह है कि लंबे समय से उन्हें एमएलसी उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा चल रही थी, लेकिन अंतिम सूची में उनका नाम नहीं है.

मंत्री हैं, लेकिन किसी सदन के सदस्य नहीं

दीपक प्रकाश फिलहाल बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री हैं. हालांकि वे न तो विधायक हैं और न ही विधान परिषद के सदस्य. भारतीय संविधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति मंत्री बन सकता है, लेकिन उसे छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी होता है. यदि ऐसा नहीं होता है तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है.

यही कारण है कि इस एमएलसी चुनाव को दीपक प्रकाश के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था. राजनीतिक जानकारों का मानना था कि उन्हें विधान परिषद भेजकर उनकी संवैधानिक बाध्यता पूरी कर दी जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

आखिर टिकट क्यों नहीं मिला?

एनडीए के सामने इस बार सीटों का गणित सबसे बड़ी चुनौती था. विधान परिषद की 9 सीटों के लिए गठबंधन के सभी दल अपने-अपने दावे पेश कर रहे थे. भाजपा ने अपने हिस्से की चार सीटों पर भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह, डॉ. संजय मयूख, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित को उम्मीदवार बनाया. वहीं जदयू ने निशांत कुमार, भारती मेहता, शिवरानी देवी प्रजापति और ललन प्रसाद को टिकट दिया. इसके अलावा एलजेपी (आर) को भी एक सीट मिली. ऐसे में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के लिए कोई सीट नहीं बची और दीपक प्रकाश का दावा पीछे छूट गया.

संख्या बल ने भी सीमित किए विकल्प

विधान परिषद चुनाव में जीत का गणित विधानसभा के संख्याबल पर आधारित होता है. एक सीट जीतने के लिए करीब 25 विधायकों के वोट की जरूरत पड़ती है. एनडीए के पास इतनी संख्या है कि वह अपने 8 उम्मीदवारों को आराम से जिता सकता है. लेकिन इसके बाद अतिरिक्त सीट निकालना आसान नहीं था. यही वजह रही कि सहयोगी दलों के बीच सीटों का बंटवारा काफी सीमित दायरे में हुआ.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन की मजबूरियों और सीटों की सीमित संख्या ने दीपक प्रकाश की राह कठिन कर दी.

क्या मंत्री पद पर मंडरा रहा है खतरा?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि दीपक प्रकाश विधान परिषद नहीं पहुंचते हैं तो उनका मंत्री पद क्या होगा? राजनीतिक गलियारों में इसको लेकर चर्चाएं तेज हैं. विपक्ष भी इस मुद्दे पर नजर बनाए हुए है. हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ेगा या नहीं, क्योंकि राजनीतिक दल अक्सर ऐसे मामलों में वैकल्पिक रास्ते तलाशते हैं.

संभव है कि भविष्य में किसी सीट के खाली होने या किसी अन्य राजनीतिक समीकरण के जरिए उन्हें सदन तक पहुंचाने की कोशिश की जाए. लेकिन फिलहाल ऐसी कोई स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं है.

उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी के लिए भी सवाल

दीपक प्रकाश राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख और राज्यसभा सांसद उपेन्द्र कुशवाहा के बेटे हैं. ऐसे में उन्हें टिकट मिलना केवल व्यक्तिगत मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे गठबंधन के भीतर राष्ट्रीय लोक मोर्चा की राजनीतिक स्थिति से जोड़कर भी देखा जा रहा है. यह घटनाक्रम संकेत देता है कि सीट बंटवारे में बड़ी पार्टियों की प्राथमिकता अधिक प्रभावी रही.

जरूरत पड़ी तो एमएलसी चुनाव के लिए 18 जून को मतदान होगा. लेकिन चुनाव से पहले ही उम्मीदवारों की सूची ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दीपक प्रकाश के लिए कोई नया राजनीतिक रास्ता निकलेगा या फिर मंत्री पद उन्हें छोड़ना पड़ेगा?

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Published by: Abhinandan Pandey

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