कपूरथला RFC : जहां स्‍टेनलेस स्टील की चादरें बनती हैं देश की रफ्तार, ऐसे तैयार होती है हाई-स्पीड ट्रेन

Vande Bharat Coach manufacturing Rcf Kapurthala Report : कपूरथला की RCF फैक्ट्री में कैसे बनती है वंदे भारत ट्रेन की बोगी? जानिए स्टील कटिंग से लेकर हाई-स्पीड कोच तैयार होने तक की पूरी कहानी.

Vande Bharat Coach manufacturing Rcf Kapurthala Report : पंजाब के शांत और व्यवस्थित शहर कपूरथला (RCF Kapurthala) में कदम रखने पर ऐसा लगा कि यहां मक्के की रोटी और सरसों के साग को थोड़ी सी सांस्कृतिक विरासत के अलावा यहां होगा ही क्या! क्योंकि यहां भी संस्‍कृति तेजी से बदल रही है. महंगी महंगी गाड़ियां और खेतों के किनारे हाइवे से गुजरते वक्‍त बहुत ज्‍यादा एक्‍साइटमेंन नहीं था. मगर जैसे ही हमें कपूरथला रेल कोच फैक्ट्री का बोर्ड दिखा और जैसे ही हम इस परिसर में दाखिल हुए. बहुत सारे पूर्वाग्रह खत्म होते गए.

खास था ये अहसास

यह एहसास हो जाता है कि यहां कुछ खास है. जब भारत सरकार के Press Information Bureau (PIB) पटना के भारत भ्रमण कार्यक्रम के तहत पटना के पत्रकारों का दल Rail Coach Factory Kapurthala पहुंचा, तो सामने था 1100 एकड़ का भारत की रेल यात्रा का भविष्य गढ़ता एक विशाल परिसर. यहां हमारी मुलाकात विनोद कटोच से हुई जो यहां वरिष्‍ठ जनसंपर्क अधिकारी के रूप में तैनात थे. उन्होंने बताया कि यह फैक्ट्री नए भारत का निर्माण कर रही है. पहली नजर में यह सिर्फ एक फैक्ट्री लगती है, लेकिन जैसे-जैसे हम भीतर बढ़े, हर सेक्शन एक कहानी कहता नजर आया. आत्मनिर्भर भारत की, तकनीक की और उस रफ्तार की, जिस पर आज का भारत दौड़ रहा है.

स्टील की चादर से बोगी बनने तक एक जीवंत सफर

जब हमने कारखाने में कदम रखा तो हमें एक ऐसा कारखाना देखने को मिला जो बिना लाइट के रौशन था. और करीब एक किलोमीटर लंबा था. यहां स्टील की चादरों को आकार दिया जा रहा था. फैक्ट्री के अंदर सबसे पहले हम उस सेक्शन में पहुंचे, जहां स्टेनलेस स्टील की मोटी चादरों को आधुनिक लेजर मशीनों से काटा जा रहा था. मशीनों की सटीकता इतनी शानदार कि कटिंग के बाद किनारों पर कोई खुरदरापन तक नजर नहीं आता. यहां खिड़कियां, दरवाजे और फायर एग्जिट तक उसी चादर से आकार लेते हैं. इसके बाद इलेक्ट्रिक वेल्डिंग से इन हिस्सों को जोड़ा जाता है. इतनी सफाई से कि जोड़ का निशान ढूंढना मुश्किल हो जाए. कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर अगले प्‍लेटफॉर्म पर, वही चादर धीरे-धीरे एक पूरी रेल बोगी का रूप लेने लगती हैं. यह दृश्य सचमुच रोमांचित कर देता है.

‘जीवंत’ होने लगती है बोगी 

कटिंग और वेल्डिंग के बाद बोगी को एक प्लेटफार्म पर फिक्स किया जाता है. यहीं से उसमें ‘जान’ डाली जाती है. ताकि इसके नीचे पहिए और दूसरे उपकरण लगाए जा सके. इस प्‍लेटफॉर्म पर यहां वायरिंग और फ्लोरिंग की जाती है. पंखे लाइट, ट्यूब लाइट, एसी की फिटिंग के लिए वायर के कनेक्शन बनाए जाते हैं. इसके बाद पहिए लगाए जाते हैं, जो Rail Wheel Factory से मंगाए जाते हैं. फ्लोरिंग में पहले मजबूत बेस, फिर विशेष फ्लोर लेयर लगाई जाती है. पेंटिंग से पहले पुट्टी से फिनिशिंग, फिर पेंट, और अंत में पानी से धुलाई. ताकि लीकेज की जांच हो सके.

सीट, बेड और टेक्नोलॉजी, हर बारीकी का ख्याल

इसके बाद बोगियों में कुर्सियां, बेड, रैक और सीटिंग अरेंजमेंट लगाने के लिए भेज दिया जाता है. अब बारी आती है इलेक्ट्रिक इक्‍वीपमेंट लगाने की. अब यहां सभी इलेट्रिक इक्‍वीपमेंट लगाए जाते हैं. इनमें बल्ब, एलईडी, लाइट्स और डिस्‍प्‍ले आदी सारे इक्विपमेंट होते हैं. नीचे भी पानी के पंप, बैटरी, ऐसी इक्‍वीप्‍मेंट और मोबाइल चार्ज करने की व्‍यवस्‍था के लिए स्‍वीच और पोर्ट लगाए जाते हैं.

यहीं तैयार होती हैं भारत की ‘हाई-स्पीड पहचान’

कपूरथला की यह फैक्ट्री सिर्फ कोच नहीं बनाती, बल्कि भारत के आधुनिक रेल युग की पहचान भी गढ़ती है. यहीं Vande Bharat Express और Namo Bharat (RRTS) जैसी ट्रेनों की बोगियां तैयार होती हैं. जो 160 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ती हैं और भविष्य में 200 किमी/घंटा तक पहुंचने की क्षमता रखती हैं.

क्या खास है इन नई बोगियों में?

  • बोगियां स्टेनलेस स्टील की, जंग नहीं, लंबी उम्र
  • हल्का वजन (करीब 24 टन)
  • एयर सस्पेंशन, सफर में झटके लगभग खत्म
  • डिस्क ब्रेक, तेज रफ्तार पर भी बेहतर नियंत्रण
  • पुराने 40 टन के भारी कोचों की तुलना में ये बोगियां तेज, सुरक्षित और ज्यादा आरामदायक हैं.
  • कोच पूरी तरह से इलेक्‍ट्रॉनिक सिस्‍टम पर काम करते हैं.

अब बदल जाएगी ‘पुरानी आदतें’

एक वक्त था जब ट्रेन रोकने के लिए ‘वैक्यूम पाइप’ खोल दी जाती थी या चेन पुलिंग आम बात थी. लेकिन अब नई तकनीक ने इन सबको पीछे छोड़ दिया है. वैक्यूम सिस्टम खत्म हो चुका है. अब गाड़ियों में चेन पुलिंग नहीं भी नहीं की जा सकेगी. इसके लिए अब अलग व्यवस्था ही कर दी गई है. अब कोच में इमरजेंसी के लिए कम्युनिकेशन बॉक्स लगाए गए हैं. जिस पर एक बटन लगा है. अब यात्री सीधे ड्राइवर या कंट्रोल रूम से संपर्क कर सकते हैं.

आत्मनिर्भर भारत की मिसाल

फैक्ट्री में अधिकारियों ने बताया कि यहां हर साल 2500 से ज्यादा कोच बनते हैं। यानी रोजाना करीब 8 कोच. जब हम इस पूरे सफर को देख कर बाहर निकले, तो यह सिर्फ एक रिपोर्टिंग नहीं रही थी. यह उस भारत को देखने का अनुभव था, जो तेजी से बदल रहा है. यहां स्टील की चादर सिर्फ बोगियां नहीं बनतीं, बल्कि वे देश की रफ्तार, तकनीक और आत्मनिर्भरता की कहानी गढ़ती हैं.

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लेखक के बारे में

By Keshav Suman Singh

बिहार-झारखंड और दिल्ली के जाने-पहचाने पत्रकारों में से एक हैं। तीनों विधाओं (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और वेब) में शानदार काम का करीब डेढ़ दशक से ज्‍यादा का अनुभव है। वर्तमान में प्रभात खबर.कॉम में बतौर डिजिटल हेड बिहार की भूमिका निभा रहे हैं। इससे पहले केशव नवभारतटाइम्‍स.कॉम बतौर असिसटेंट न्‍यूज एडिटर (बिहार/झारखंड), रिपब्लिक टीवी में बिहार-झारखंड बतौर हिंदी ब्यूरो पटना रहे। केशव पॉलिटिकल के अलावा बाढ़, दंगे, लाठीचार्ज और कठिन परिस्थितियों में शानदार टीवी प्रेजेंस के लिए जाने जाते हैं। जनसत्ता और दैनिक जागरण दिल्ली में कई पेज के इंचार्ज की भूमिका निभाई। झारखंड में आदिवासी और पर्यावरण रिपोर्टिंग से पहचान बनाई। केशव ने करियर की शुरुआत NDTV पटना से की थी।

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