DSP Rajesh Sharma: बिहार सरकार ने हाल ही में पुलिस महकमे में बड़ा फेरबदल करते हुए 12 आईपीएस और 53 डीएसपी अधिकारियों का ट्रांसफर किया है. इस लिस्ट में सबसे ज्यादा चर्चा डीएसपी राजेश शर्मा की हो रही है. सरकार ने उन्हें मद्यनिषेध एवं राज्य स्वापक नियंत्रण ब्यूरो में डीएसपी के पद पर तैनात किया है. इस फैसले के सामने आते ही विवाद शुरू हो गया है.
भोजपुर के चर्चित भरत तिवारी कथित एनकाउंटर मामले में राजेश शर्मा के खिलाफ हत्या की एफआईआर दर्ज है. पीड़ित परिवार का आरोप है कि जांच पूरी हुए बिना एक आरोपी अधिकारी को नई और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है.
क्या है भोजपुर का चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामला?
17 जून को भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र में आने वाले बिलौटी गांव के रहने वाले भरत तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई थी. पुलिस का दावा था कि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के दौरान यह एनकाउंटर हुआ. दूसरी तरफ, भरत के परिवार की कहानी बिल्कुल अलग है.
परिजनों का कहना है कि भरत उस समय फेसबुक लाइव कर रहा था. उसने पुलिस को देखकर अपने हथियार जमीन पर डाल दिए थे और सरेंडर कर रहा था. इसके बावजूद पुलिसकर्मियों ने उसे धक्का देकर गड्ढे में गिराया और गोली मार दी. परिवार का सीधा आरोप है कि मौके पर मौजूद तत्कालीन एसडीपीओ राजेश शर्मा ने ही पुलिसवालों को गोली चलाने का हुक्म दिया था.
डीएसपी और थाना प्रभारी समेत कई पुलिसवालों पर हत्या का केस
इस घटना के बाद भरत तिवारी की मां आशा देवी ने न्याय के लिए आवाज उठाई. उनकी शिकायत पर शाहपुर थाने में हत्या जैसी गंभीर धाराओं में एक मुकदमा दर्ज किया गया. इस एफआईआर में तत्कालीन एसडीपीओ राजेश शर्मा, तत्कालीन थाना प्रभारी राजेश मालाकार और एनकाउंटर की टीम में शामिल दूसरे पुलिसकर्मियों को नामजद आरोपी बनाया गया है.
केस दर्ज होने के बाद राजेश शर्मा को जगदीशपुर के पद से हटाकर पुलिस मुख्यालय बुला लिया गया था, लेकिन अब उन्हें नई पोस्टिंग दे दी गई है. भरत के पिता काशीनाथ तिवारी का कहना है कि आरोपी अफसर को नई जिम्मेदारी मिलने से उनका न्याय पर भरोसा कमजोर हो रहा है. उनका आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक दोषियों को सजा नहीं मिल जाती.
बिहार पुलिस में दरोगा से डीएसपी तक का सफर
राजेश शर्मा बिहार पुलिस के सीनियर अफसरों में गिने जाते हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक दरोगा (सब-इंस्पेक्टर) के रूप में की थी. लंबे समय तक अलग-अलग जिलों में थाना प्रभारी और इंस्पेक्टर के रूप में काम करने के बाद उनका प्रमोशन हुआ और वे डीएसपी बने.
हाल ही में वे भोजपुर के जगदीशपुर में एसडीपीओ के रूप में काम देख रहे थे. पुलिस विभाग इस नई तैनाती को एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बता रहा है, लेकिन एफआईआर के बाद भी पोस्टिंग देने की वजहों पर खुलकर कुछ भी नहीं कहा गया है.
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मुजफ्फरपुर का 19 साल पुराना मामला भी आया सुर्खियों में
इस नए विवाद के बाद राजेश शर्मा के करियर का एक पुराना पन्ना भी खुल गया है. साल 2007 में जब वे मुजफ्फरपुर के सदर थाना प्रभारी थे, तब 4 नवंबर की रात पुलिस तीन युवकों मनीष महिवाल, मुकुल ठाकुर और सुबोध कुमार सिंह को पूछताछ के लिए ले गई थी. अगले दिन तीनों के शव एमआईटी कॉलेज के पास मिले. पुलिस ने इसे मुठभेड़ बताया था, जबकि परिवारों ने इसे सीधे-सीधे फर्जी एनकाउंटर कहा था.
मनीष की मां अनिता देवी आज भी इंसाफ के लिए भटक रही हैं. उनका कहना है कि उस वक्त सीआईडी जांच में पुलिसकर्मियों को क्लीन चिट दे दी गई थी, जबकि मानवाधिकार आयोग के सामने पुलिसवालों के बयानों में काफी अंतर था और बरामद हथियारों के सबूत भी साफ नहीं थे. अनिता देवी का कहना है कि अगर 19 साल पहले उनके बेटे के मामले में सही जांच हो जाती, तो आज भरत तिवारी की जान बच सकती थी.
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