बिरसा मुंडा जनजातीय समाज के लिए आशा की किरण थे : राज्यपाल

बिरसा मुंडा ने पूरे देश में आजादी की लड़ाई को नयी दिशा दी.

गंगा देवी महिला कॉलेज में संगोष्ठी का आयोजन

संवाददाता, पटना

बिरसा मुंडा ने पूरे देश में आजादी की लड़ाई को नयी दिशा दी. उन्होंने आदिवासियों को ब्रिटिश शासन और जमींदारी प्रथा के शोषण से लड़ने के लिए प्रेरित किया. वह जनजातीय समाज के लिए आशा की किरण थे. ये बातें बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खां ने कहीं. वह सोमवार को गंगा देवी महिला कॉलेज में जनजातीय लोगों का उपनिवेशीकरण : उलगुलान में बिरसा मुंडा विषय पर दो दिवसीय संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे. उनका अत्याचार, शोषण और अन्याय के खिलाफ किया गया कार्य आज भी प्रेरणादायक है. बिरसा मुंडा की कल्पना थी कि वे खुद नहीं, आने वाली नस्लें प्रतिष्ठा-सम्मान के साथ आजाद होकर चल सकें. राज्यपाल ने देश पर लगाये गये भारी टैरिफ पर नागरिकों को चेताते हुए कहा कि ऐसे में अगर जरूरत पड़े, तो देश के लिए त्याग और बलिदान देने को तैयार रहें. राज्यपाल ने कहा कि स्वतंत्रता या कोई भी अधिकार वन टाइम एक्ट नहीं है. जब तक हम शास्वत रूप से जागरूक नहीं रहेंगे, स्वतंत्रता को बचाकर नहीं रख सकेंगे. खुद के लिए ही नहीं, औरों के लिए हमें जीना है. हमें अपने विशेष गुण का प्रयोग समाज और देश के लिए करना चाहिए. इसमें प्राथमिकता सबसे कमजोर और सीढ़ी के आखिरी पायदान पर रहने वाले के लिए देना चाहिए. इससे पहले राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, कुलपति प्रो उपेंद्र प्रसाद सिंह, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के सदस्य सचिव प्रो धनंजय सिंह, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज मुंबई के कुलपति प्रो बद्रीनारायण, राष्ट्रीय जनजातीय आयोग की सदस्य आशा लाकरा, गंगा देवी महिला महाविद्यालय की प्राचार्य विजय लक्ष्मी और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रो संजय पासवान, प्रतिकुलपति प्रो गणेश गणेश माहतो ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया.

महापुरुषों के जीवन का करें अध्ययन

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज मुंबई के कुलपति प्रो बद्रीनारायण ने कहा कि विकसित भारत का सपना तभी पूर्ण होगा, जब हम अपने दायरे को बढ़ाएं. उन्होंने युवाओं से अपील की कि आजादी की लड़ाई में भाग लेने वाले बिरसा मुंडा एवं अन्य महापुरुषों के जीवन पर अध्ययन करें.

जनजातियों को जानने की जरूरत

पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो उपेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि महाविद्यालयों में ऐसे आयोजन होने चाहिए. हमारी तरफ से जो भी सहयोग होगा, हम करेंगे. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ फिरमी बोडो ने जनजातियों के उपनिवेश मुक्तिकरण के बारे में चर्चा की. साथ ही असम, अरुणाचल प्रदेश तथा देश भर के जनजातियों के इतिहास को समझने और जानने के लिए प्रेरित किया. दिल्ली यूनिवर्सिटी इतिहास विभाग के प्रो निर्मल कुमार ने सिनेमा की दृष्टि से जनजातीय विमर्श पर बात की. सत्र का संचालन डॉ दीक्षा सिंह ने किया. इस अवसर पर पीपीयू प्रति कुलपति प्रो गणेश माहतो, कुलसचिव प्रो एनके झा, डॉ उर्वशी गौतम, प्रो प्रेमांशी जयदेव, सीसीडीसी की प्रो रिमझिम शील, डॉ खुशबू एवं डॉ वंदना मौजूद रहीं.

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Published by: Anurag pradhan

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