बिहार की राजनीति में बदलता समीकरण: ‘छोटे भाई’ से ‘बड़े भाई’ कैसे बनी भाजपा? JDU होती गई पीछे

Nitish Kumar: बिहार की राजनीति में भाजपा और जेडीयू का गठबंधन भले ही पुराना हो, लेकिन अब इसकी ताकत का संतुलन बदलता दिख रहा है. कभी एनडीए में ‘बड़े भाई’ की भूमिका निभाने वाली जेडीयू अब पीछे नजर आ रही है, जबकि भाजपा लगातार मजबूत होकर ‘सीनियर पार्टनर’ बनने की ओर बढ़ चुकी है.

Nitish Kumar: बिहार की राजनीति में भाजपा और जेडीयू का गठबंधन कोई नया नहीं है. यह साझेदारी तीन दशक से भी ज्यादा पुरानी है. लेकिन समय के साथ इस गठबंधन की ताकत का संतुलन पूरी तरह बदलता नजर आ रहा है. कभी जेडीयू के नेतृत्व में चलने वाला एनडीए आज ऐसी स्थिति में पहुंच गया है जहां भाजपा की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के ऐलान ने इस राजनीतिक बदलाव को और ज्यादा स्पष्ट कर दिया है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में एनडीए की राजनीति अब उस दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां भाजपा ‘सीनियर पार्टनर’ की भूमिका में दिखने लगी है, जबकि जेडीयू की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही.

लालू के खिलाफ गठबंधन से शुरू हुई थी साझेदारी

1990 के दशक में बिहार की राजनीति पर लालू प्रसाद यादव का दबदबा था. उस दौर में लालू विरोधी राजनीति को संगठित करने की जिम्मेदारी नीतीश कुमार ने उठाई. उन्होंने अपनी समता पार्टी के जरिए भाजपा के साथ मिलकर एक मजबूत राजनीतिक विकल्प तैयार किया.

उस समय राजनीतिक समीकरण ऐसे थे कि नीतीश कुमार का कद बिहार में तेजी से बढ़ रहा था. समता पार्टी और बाद में जेडीयू का आधार काफी मजबूत माना जाता था. भाजपा उस समय राज्य में अपेक्षाकृत छोटी सहयोगी पार्टी की भूमिका में थी.

2005 में नीतीश के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार

साल 2000 के विधानसभा चुनाव झारखंड अलग होने से पहले हुए थे. उस समय तक नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में एक मजबूत और स्वीकार्य नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे. इसके बाद अक्टूबर 2005 में बिहार में पहली बार नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी. इस चुनाव में जेडीयू ने 88 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई, जबकि भाजपा को 55 सीटें मिली थीं. यह साफ संकेत था कि गठबंधन में जेडीयू ही ‘सीनियर पार्टनर’ है और भाजपा ‘छोटे भाई’ की भूमिका में है.

2010 में नीतीश की लोकप्रियता का चरम

2010 का विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार के राजनीतिक करियर का सबसे मजबूत दौर माना जाता है. उस चुनाव में जेडीयू ने 115 सीटें जीतकर बड़ी सफलता हासिल की थी. भाजपा ने भी अच्छा प्रदर्शन करते हुए 91 सीटें जीती थीं, लेकिन सीट शेयरिंग में भी जेडीयू को ज्यादा सीटें मिली थीं. उस समय तक बिहार की राजनीति में यह धारणा बन चुकी थी कि एनडीए में नेतृत्व पूरी तरह नीतीश कुमार के हाथ में है.

2013 में टूटा गठबंधन, 2014 में बदला राजनीतिक समीकरण

बदलाव की शुरुआत 2013 में हुई, जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया. इस फैसले से असहज होकर नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया. इसके बाद उन्होंने राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया.

लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में राजनीतिक तस्वीर बदल गई. भाजपा ने बिहार में शानदार प्रदर्शन किया, जबकि जेडीयू केवल 2 सीटों पर सिमट गई. यह पहली बार था जब साफ संकेत मिला कि भाजपा का जनाधार अब बिहार में स्वतंत्र रूप से भी मजबूत हो चुका है.

2015 में महागठबंधन की जीत, लेकिन भाजपा का वोट शेयर मजबूत

2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और महागठबंधन को जीत मिली. हालांकि इस चुनाव में भी भाजपा ने अकेले दम पर 24.4 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया. यह किसी भी एक पार्टी के मुकाबले ज्यादा था. इससे साफ हो गया कि भाजपा का वोट बैंक बिहार में लगातार मजबूत हो रहा है.

2017 में एनडीए में वापसी, लेकिन बदल चुका था समीकरण

2017 में नीतीश कुमार ने फिर से एनडीए में वापसी की. लेकिन इस बार राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी थीं. भाजपा का कद पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका था. गठबंधन के भीतर अब भाजपा की सौदेबाजी की ताकत पहले से ज्यादा मजबूत हो गई थी.

2020 चुनाव: पहली बार भाजपा जेडीयू से आगे

2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने मिलकर चुनाव लड़ा. इस चुनाव में भाजपा ने 74 सीटें जीतीं, जबकि जेडीयू को सिर्फ 43 सीटों पर जीत मिली. यह पहला मौका था जब एनडीए के भीतर भाजपा, जेडीयू से काफी आगे निकल गई. हालांकि राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री पद नीतीश कुमार को ही दिया गया. इस चुनाव में चिराग पासवान की पार्टी ने जेडीयू की कई सीटों पर उम्मीदवार उतारकर समीकरण को और जटिल बना दिया था.

2024 और 2025 के चुनावों में बराबरी की लड़ाई

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और जेडीयू दोनों को 12-12 सीटें मिलीं. इससे यह संकेत मिला कि गठबंधन में अब दोनों दल लगभग बराबरी की स्थिति में हैं. इसके बाद 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि जेडीयू 85 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही.

इस चुनाव की खास बात यह रही कि पहली बार एनडीए में रहते हुए जेडीयू और भाजपा ने लगभग बराबर सीटों पर चुनाव लड़ा. दोनों दलों ने 101-101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे.

भाजपा का बढ़ता जनाधार

राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका स्थिर वोट बैंक है. भाजपा का कोर वोट लगातार बना रहा, जबकि जेडीयू का वोट शेयर कई बार गठबंधन बदलने और एंटी-इंकंबेंसी के कारण प्रभावित हुआ.

2014 के बाद भाजपा ने बिहार के ग्रामीण इलाकों और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) में अपनी पकड़ मजबूत की. यह वही सामाजिक आधार था जिसे पहले नीतीश कुमार की राजनीतिक ताकत माना जाता था.

आगे क्या होगा?

बिहार की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी दिख रही है. नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले के बाद यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि भविष्य में एनडीए के भीतर नेतृत्व का स्वरूप क्या होगा.

एक समय था जब बिहार की राजनीति में जेडीयू निर्णायक भूमिका निभाती थी, लेकिन अब भाजपा लगातार अपने संगठन और वोट बैंक के दम पर ‘सीनियर पार्टनर’ की स्थिति की ओर बढ़ती नजर आ रही है.

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लेखक के बारे में

By Abhinandan Pandey

भोपाल से शुरू हुई पत्रकारिता की यात्रा ने बंसल न्यूज (MP/CG) और दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अनुभव लेते हुए अब प्रभात खबर डिजिटल तक का मुकाम तय किया है. वर्तमान में पटना में कार्यरत हूं और बिहार की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को करीब से समझने का प्रयास कर रहा हूं. गौतम बुद्ध, चाणक्य और आर्यभट की धरती से होने का गर्व है. देश-विदेश की घटनाओं, बिहार की राजनीति, और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि रखता हूं. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स के साथ प्रयोग करना पसंद है.

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