विशेष साक्षात्कार
प्रत्येक को न्याय मिले, यह जरूरी है, पर समय पर मिले, यह उससे भी जरूरी है. लेकिन क्या दुनिया के सबसे बड़े लाेकतंत्र में ऐसा हो पा रहा है? बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बीच काम कर रही न्यायपालिका के पास जहां मामलों की लंबी लिस्ट है, वहीं न्यायाधीशों की भारी कमी. प्रत्येक 10 लाख की आबादी पर सिर्फ 12 न्यायाधीश हैं. फिर भी रोजाना 150 मामलों का निबटारा होता है. दूसरी अोर देश के अधिकांश हाइकोर्टों की स्थिति ऐसी है कि वहां न्यायाधीशों की संख्या जरूरत से काफी कम है.
हालात ऐसे ही रहे, तो सिर्फ 16 हजार जज के सहारे 3.2 करोड़ लंबित मामले के निबटारे में 300 साल लग सकते हैं. आज दबाव के बीच कैसे कार्य कर रही हैं अदालतें, समय पर कैसे न्याय मिल सके, क्या हैं योजनाएं जैसे मुद्दे पर ‘द वीक’ की विशेष संवाददाता सोनी मिश्रा ने देश के प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर से बातचीत की. पेश है विशेष साक्षात्कार के प्रमुख अंश.
क्या अदालतों के समक्ष इस समय सबसे बड़ी चुनौती बड़ी संख्या में मामलों का लंबित होना है?
हाइकोर्टाें में 30 जून, 2015 को 40,05,704 मामले लंबित थे. निचली अदालतों में तो यह संख्या 2,71,56,020 थी. देश में लंबित मामलों की कुल संख्या 3,11,61,724 थी. कुछ खास किस्म को मामलों को निपटाने के लिए एक तय समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए. जब तक मामला उस सीमा से अधिक पुराना नहीं हो जाये, उसे लंबित मामला नहीं मानना चाहिए. मौजूदा वक्त में, किसी भी तरह के मामले को निपटाने के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं है. ऐसे में एक भ्रांति के रूप में, अदालतों में चल रहे मामलों की संख्या को ही लंबित मामले मान लिया जाता है.
हमारे पास यह तय करने का कोई विश्वसनीय फॉर्मूला नहीं है कि किसी मामले की सुनवाई कितने समय में पूरी हो जानी चाहिए. अब तक किसी न्यायिक आयोग, अदालत या एजेंसी ने यह नहीं तय किया है कि कोई सिविल या क्रिमिनल केस कितने समय में निपट जाना चाहिए. अदालतों के समक्ष अलग-अलग तरह के मामले हैं. इनमें ट्रैफिक चालान जैसे मामले तो 15 मिनट में निपटाये जा सकते हैं.
क्या देश में आबादी और न्यायाधीशों का अनुपात एक बड़ी समस्या है?
यूनिवर्सिटी ऑफ कॉरनेल और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के दो प्रोफेसर हमारे यहां आये थे. उन्होंने मामलों को निपटाने की समय सीमा तीन साल तय की है. यदि आप अमेरिका में आबादी के अनुपात में न्यायाधीशों की उपलब्धता का अनुपात देखें, तो वहां के लिए यह एक उचित समय-सीमा है. प्रत्येक दस लाख आबादी पर अमेरिका में 151 न्यायाधीश हैं. लेकिन, भारत में यह अनुपात प्रत्येक दस लाख आबादी पर सिर्फ 12 न्यायाधीशों का है.
मामलों के लंबित रहने की एक आदर्श समय-सीमा क्या हो सकती है?
भारत में आबादी के अनुपात में न्यायाधीशों की कम उपलब्धता और बुनियादी ढांचागत सुविधाओं की कमी के बावजूद, औसत आधार पर देखें, तो तीन से पांच साल की सीमा एक उचित अवधि है, जिसमें कोई मामला निपट जाना चाहिए. 30 जून, 2015 को एक साल से अधिक समय से चल रहे मामलों की संख्या 2,15,69,264 थी. भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप यदि पांच साल की समय-सीमा मान ली जाये, तो देश में पांच साल से अधिक समय से लंबित मामलों की संख्या 81 लाख है.
तो फिर लक्ष्य को कैसे हासिल किया जा सकता है?
इस समय हमारे पास एक राष्ट्रीय न्यायिक प्रबंधन प्रणाली है. इसमें विचार यह है कि कोई ऐसा मानक विकसित होना चाहिए, जिससे न्यायाधीशों की कार्यक्षमता आंकी जा सके और उसे बेहतर किया जा सके. इसके लिए कुछ मानक तय किये जा सकते हैं, जैसे- ट्रेनिंग, मामलों का समयबद्ध निपटारा, एक न्यायाधीश पर मामलों के अधिकतम बोझ की सीमा और कोई न्यायाधीश कैसे अधिकतम मामलों का प्रबंधन कर सकता है. यह कमेटी ‘पांच प्लस जीरो’ का लक्ष्य लेकर चल रही है.
मतलब यह कि पांच साल से अधिक पुराने केसों की संख्या शून्य करने का प्रयास हो रहा है. इसमें पांच साल से पुराने केसों को प्राथमि कता के आधार पर निपटाने पर जोर है. इस तरह हमारी प्राथमिकता में ऐसे 81 लाख मामले हैं. यदि हम इन्हें जल्द निपटा देते हैं, तो यह हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी. और फिर हम गर्व से कह सकेंगे कि हमारे देश में पांच साल से अधिक पुराना कोई मामला लंबित नहीं है.
क्या 81 लाख मामलों का पांच साल से अधिक समय से लंबित होना तर्कसंगत है?
लोग अदालत तक पहुंच रहे हैं और मामले दायर कर रहे हैं, यह एक अच्छा और उत्साहवर्धक संकेत है. इससे पता चलता है कि हमारी न्यायिक व्यवस्था में लोगों का विश्वास खत्म नहीं हुआ है. संविधान में न्याय तक आसान पहुंच को मौलिक अधिकार के रूप में दर्ज किया गया है. न्याय पाने से रोकने या इसमें विलंब करने, बाधा डालने की इजाजत किसी को नहीं है.
न्यायपालिका के समक्ष मामलों का जखीरा लगातार बढ़ने के क्या कारण हैं?
पहला कारण तो आबादी के अनुपात में न्यायाधीशों की कम उपलब्धता ही है. मैं पहले ही बता चुका हूं कि आबादी के अनुपात में हमारे देश में अमेरिका की तुलना में दस गुना से भी कम न्यायाधीश हैं. अमेरिका में एक न्यायाधीश एक दिन में औसतन तीन से पांच मामलों को देखता है. भारत में यह संख्या 150 तक हो जाती है. अब वह बेचारा यदि मामले की सुनवाई अगली तारीख तक टालता भी है, तो इसके लिए उसे प्रत्येक मामले में पांच-छह लाइनें लिखनी पड़ती है, इस तरह यह करीब एक हजार लाइन प्रतिदिन तक हो जाता है. और यदि उसे कोई फैसला सुनाना है, तब तो उसे इससे भी काफी अधिक काम करना पड़ता है.
देश में न्यायाधीशों को बेहतर बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है. उन्हें कंप्यूटर चाहिए. उन्हें ट्रेनिंग चाहिए. उन्हें एक बेहतर सहयोगी सिस्टम की जरूरत है. बहुत सी ऐसी अदालतें भी हैं, जहां स्टेनोग्राफर तक नहीं हैं और न्यायाधीशों को हर चीज खुद लिखनी पड़ रही है. कई अदालत परिसरों में उनके लिए आवास नहीं है. हमारे यहां ऐसी पुरानी इमारतों में भी अदालतें चल रही हैं, जिनकी छतों से पानी रिसता है या जहां वादी के कमरे या बार रूम तक नहीं हैं.
इन असुविधाओं के बावजूद, न्यायाधीश काम कर रहे हैं, भले ही इसके लिए उन्हें बरामदे में बैठना पड़े या फिर पेड़ की छाया में बैठ कर सुनवाई करनी पड़े. उन्हें अपने काम के प्रति जवाबदेह बनाया गया है और उनके कामों की उच्च न्यायालयों द्वारा मॉनीटरिंग हो रही है. न्यायपालिका से अधिक उत्तरदायी, जवाबदेह और प्रभावी मॉनीटरिंग सिस्टम शायद और कहीं नहीं है.
न्यायाधीशों के प्रदर्शन की रिपोर्ट हर माह तैयार की जाती है. दूसरी बात यह है कि किसी भी मामले में दो पक्ष होते हैं- वादी और प्रति वादी. अकसर इनमें एक पक्ष की रुचि मामले को लंबा खींचने में होती है. वे फैसले को लंबे समय तक टालना चाहते हैं, इसलिए उनके वकील भी सुनवाई स्थगित कराने के लिए इच्छुक होते हैं. इसके लिए वे तमाम तरह के बहाने बनाते रहते हैं- वे बीमार हैं, गले में इन्फेक्शन है इत्यादि . इसलिए मुकदमे के लंबित रहने में इसके किसी पक्ष की भूमिका, और वकीलों द्वारा उन्हें ऐसे करने के लिए प्रेरित करने, को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
निश्चित रूप से कुछ जवाबदेही वकीलों के लिए भी होनी चाहिए. ऐसे ठोस प्रयास करने की जरूरत है जिससे वकीलों को इस जवाबदेही का अहसास हो और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को सुरक्षित रखा जा सके.
देश में कितने और न्यायाधीशों की जरूरत है?
इस समय हाइकोर्टों में न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों की संख्या 1,016 है, जिनमें से करीब 400 पद रिक्त हैं. इसलिए देश के ज्यादातर हाईकोर्ट अपनी क्षमता से आधे काम ही कर पा रहे हैं. पिछले आठ महीनों के दौरान एनजेएसी को लेकर तकरार के कारण कोई नयी नियुक्ति नहीं हो पायी है. इसी तरह निचली अदालतों में न्यायाधीशों के करीब 5,000 पद खाली पड़े हैं. हाइकोर्ट और निचली अदालत मिला कर न्यायाधीशों के रिक्त पदों की कुल संख्या 5,449 है.
यह रिक्ति तो स्वीकृत पदों के आधार पर है, जबकि देश में इससे कहीं अधिक संख्या में न्यायाधीशों की जरूरत है. कुछ राज्यों में निचली अदालतों की नियुक्तियां लोक सेवा आयोगों के द्वारा होती हैं, जबकि कई राज्यों में यह काम हाइकोर्ट के जिम्मे है. जिन राज्यों में यह हाइकोर्ट के जिम्मे है, वहां नियुक्ति प्रक्रिया जल्द पूरी होती है.
कॉलेजियम सिस्टम कब से काम करना शुरू कर देगा?
उसने काम करना शुरू कर दिया है. सरकार को प्रक्रिया के ज्ञापन को अंतिम रूप देना है जिसके तहत कॉलेजियम काम करेगा. मेघालय उच्च न्यायालय में स्थिति बहुत चिंताजनक थी. वहां सिर्फ एक ही जज बचा था. सरकार ने हमसे लिखित रूप से कहा कि पुरानी प्रक्रिया के तहत हम काम करना शुरू कर दें. हम ऐसी स्थिति नहीं चाहते हैं जहां अदालतों में जज ही न हों. हमने सरकार से सहमति जतायी. अब जब सरकार नयी प्रक्रिया तैयार कर रही है और उसे संशोधन और सुधार के सुझाव देने हैं, नयी रिक्तियां आयेंगी और पूरे देश में जजों के ऊपर भारी दबाव बढ़ेगा. इसलिए हम अधिक देर इंतजार नहीं कर सकते. इस प्रक्रिया में समय लगेगा.
इसमें बाधाओं के भीतर बाधाएं हैं, चक्कों के भीतर चक्के हैं. कई तरह के सत्यापन होते हैं. एक नाम तय करने में छह से आठ महीने लग जाते हैं. जैसे ही नये नामों की चर्चा शुरू होती है, शिकायतें आने लगती हैं. इसलिए हमें पूरी तरह से निश्चिंत होना है. यह स्थिति राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग पर सरकार और न्यायपालिका के बीच गतिरोध के कारण ही पैदा हुई है.
क्या इसे टाला जा सकता था?
यह अवश्यंभावी था. एक संविधान संशोधन किया गया, यह अदालत तक पहुंचा. जब तक इसका निपटारा नहीं हो जाता, तब तक पुरानी व्यवस्था काम नहीं कर सकती थी. अदालत को निर्णय करने में छह महीने का समय लगा. इस मामले को रिकॉर्ड समय में निपटारे के लिए जजों ने छुट्टियों में भी काम किया. हमें इस बात से अवगत थे कि किसी तरह की देरी न्याय व्यवस्था पर असर डाल सकती थी. इस मामले पर ध्यान केंद्रित करने के कारण अन्य खंडपीठों में मामलों पर असर पड़ा. आज हमारे पास पांच रिक्तियां हैं. एक माह में एक और जगह खाली हो जायेगी. हमें काम करने देने की सरकार की पहल से आशा का संचार हुआ है.
इस साल के अंत तक पांच सौ रिक्तियां होंगी. पांच सौ जजों को खोजना आसान काम नहीं है. उस व्यक्ति पर किसी तरह का दाग नहीं होना चाहिए, उसका कार्यकाल उम्दा होना चाहिए और उसकी पृष्ठ भूमि अच्छी होनी चाहिए. इस मामले में असफलता की दर बहुत कम है, शायद 0.1 फीसदी या उससे भी कम. दो या तीन जजों के मामले में ही बरखास्तगी की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी थी. इस प्रकार यह बेहतरीन औसत है, जजों की गुणवत्ता के मामले में 99.9 फीसदी की सफलता दर. हालांकि, लोगों की अपेक्षा है कि 0.1 फीसदी की गड़बड़ी भी नहीं होनी चाहिए. इसे नौकरशाहों या सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोगों के मामले में स्वीकार किया जा सकता है, पर जजों के मामले में नहीं.
लंबित मामलों की संख्या में कमी कैसे की जा सकती है?
एक तो यह कि जजों और अदालतों की संख्या बढ़ानी होगी. दूसरा, जजों को प्रशिक्षित करना होगा, ताकि उनकी क्षमता में वृद्धि हो. फिर, बार के सदस्यों में कुछ संवेदनशीलता बढ़ानी होगी. उन्हें देर नहीं करनी चाहिए और स्थगन की मांग नहीं करनी चाहिए. चौथी बात है, सरकार द्वारा मामलों की संख्या सीमित करना. सबसे अधिक मामले सरकार द्वारा ही दर्ज किये जाते हैं. उसे हर मामले को अदालत तक नहीं लाना चाहिए. पांचवां मुद्दा यह है कि शासन का अभाव लोगों को अदालत तक आने के लिए मजबूर करता है, जिनमें सेवा और जनहित से जुड़े मसले होते हैं. वैकल्पिक विवाद निपटारा व्यवस्था, मध्यस्थता, सुलह और बीच-बचाव को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.
क्या हमने इस दिशा में कुछ किया है?
हमने इम्तियाज हुसैन के मामले में लॉ कमीशन के सामने एक संदर्भ दिया है. हम जानना चाहते थे कि एक जज के पास अधिकतम कितने मामले होने चाहिए जिन्हें वह देख सके. इस संबंध में कोई तरीका निकालना होगा. अगर उस सीमा से अधिक मामले आते हैं, तो राज्य को एक और पद की व्यवस्था करनी चाहिए. लॉ कमीशन ने फॉर्मू ला तैयार किया है. इस प्रकार, जज-आबादी अनुपात के आधार की जगह हमें जज और मामलों के औसत की ओर जाना है. बड़ी आबादीवाले राज्य भी हैं, जहां मुकदमों की संख्या बहुत अधिक नहीं है, जैसे कि झारखंड, जहां केरल से कम मुकदमे हैं.
इसलिए आबादी के आधार पर निर्धारण करने की जगह यह हम अधिक निश्चित और वास्तविक आधार पर तय कर सकते हैं. अदालत इस पर विचार कर रही है. इस संबंध में एक न्यायिक आदेश पारित किया जा सकता है. औसतन, एक जज पर 1,500 से 3,000 मामले होने चाहिए. अगर संख्या 3,500 से ऊपर जाती है, तो एक अतिरिक्त पद सृजित किया जा सकता है.
सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों को कम करने के लिए आपने क्या कदम उठाया है?
ऐसे बहुत से संवैधानिक मामले हैं जो पांच वर्ष से अधिक पुराने हैं. हम लोग हर सोमवार और शुक्रवार को दो घंटा अधिक काम करेंगे तथा जब हमारे पास समय और स्थान होगा तो ऐसे मामलों की सुनवाई करेंगे. हम कुछ मामलों पर सुनवाई करना शुरू भी कर चुके हैं.
