डि-एडिक्शन सेंटर में मरीजों की संख्या घटी

शशिभूषण कुंवर, पटना : राज्य में शराब की लत छुड़ाने के लिए स्थापित किये गये डि-एडिक्शन सेंटरों में मरीजों की संख्या में तेजी से गिरावट दर्ज हो रही है. स्थिति यह है कि शराब पीने वाले सहित गांजा, भांग, चरस व हेरोइन जैसे नशीले पदार्थों का नशा करने वाले औसतन प्रतिमाह 20 लोगों को ही […]

शशिभूषण कुंवर, पटना : राज्य में शराब की लत छुड़ाने के लिए स्थापित किये गये डि-एडिक्शन सेंटरों में मरीजों की संख्या में तेजी से गिरावट दर्ज हो रही है. स्थिति यह है कि शराब पीने वाले सहित गांजा, भांग, चरस व हेरोइन जैसे नशीले पदार्थों का नशा करने वाले औसतन प्रतिमाह 20 लोगों को ही भर्ती कराने की आवश्यकता पड़ रही है. इनमें भी शराब पीने वाले सिर्फ 20 फीसदी ही हैं.

शेष अन्य नशे के शिकार लोगों को भर्ती कराया जा रहा है. नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल स्थित स्टेट ऑफ द आर्ट डि -एडिक्शन सेंटर के विशेषज्ञों ने बताया कि यहां पर वैसे रोगी ही भर्ती होने के लिए आ रहे हैं, जो बिहार से बाहर रहते हैं .घर लौटने के बाद जब शराब नहीं मिलती, तो उनकी परेशानी बढ़ जा रही है.
राज्य में शराबबंदी के बाद बदली है स्थिति
बिहार में पूर्ण शराबबंदी के बाद मरीजों की संख्या चिंताजनक नहीं रही है. राज्य में 39 डि- एडिक्शन सेंटर हैं. राज्य मुख्यालय को प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016-17 में सभी डि-एडिक्शन सेंटरों के ओपीडी में कुल 10072 मरीज परामर्श के लिए पहुंचे, जबकि उसी वर्ष सिर्फ 1588 मरीजों को भर्ती होकर इलाज कराने की आ‌वश्यकता पड़ी. इसी तरह से वर्ष 2017-18 में डि-एडिक्शन सेंटरों के ओपीडी में 4196 और भर्ती होने के लिए 1011 मरीज पहुंचे.
वर्ष 2018-19 में ओपीडी में 4188 लोग परामर्श के लिए पहुंचे तो इस दौरान सिर्फ 961 लोगों को भर्ती कराने की आवश्यकता पड़ी. वर्ष 2019-20 में दिसंबर तक राज्य भर में 2981 लोगों ने ओपीडी में परामर्श लिया तो इस दौरान सिर्फ 791 मरीजों को भर्ती करना पड़ा. एनएमसीएच स्थित सेंटर के विशेषज्ञों का कहना है कि यहां पर प्रतिदिन औसतन 28 मरीज भर्ती रहते हैं.
इनमें से सिर्फ 20 फीसदी मरीज ही शराब की लत छुड़ाने के लिए भर्ती हो रहे हैं. शेष अन्य मरीजों को शराब से अलग प्रकार के नशे की आदत है. फॉलोअप के लिए आनेवाले मरीजों की संख्या शून्य है. 20 जनवरी तक शराब पीने वाले 11 मरीज ही ओपीडी में परामर्श के लिए पहुंचे.

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