‘‘नागरिकता संशोधन अधिनियम’’ संविधान विरोधी, भारत की सांस्कृतिक परंपरा के विरुद्ध : बिहार इप्टा

पटना : ‘हमारा संविधान देशको समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए देशके नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की आजादी, प्रतिष्ठा और अवसरों की समानता सुनिश्चितकरता है, लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र की सरकार इन संवैधानिक मूल्यों को तोड़ने में लगी है. नागरिकता संशोधनअधिनियम देशकी सर्वधर्म […]

पटना : ‘हमारा संविधान देशको समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए देशके नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की आजादी, प्रतिष्ठा और अवसरों की समानता सुनिश्चितकरता है, लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र की सरकार इन संवैधानिक मूल्यों को तोड़ने में लगी है. नागरिकता संशोधनअधिनियम देशकी सर्वधर्म समभाव और गंगा-जमुनी सांस्कृतिक विरासत के विरुद्ध है और इस अधिनियम के सहारे सावरकर के ‘टू नेशन थ्योरी’ को साधने की एक सुविचारित रणनीति है.

बिहार इप्टा अध्यक्ष मंडल के साथी प्रो. डेजी नारायण, समी अहमद, कार्यकारी अध्यक्ष सीताराम सिंह, उपाध्यक्ष मंडल के साथी प्रो. उषा वर्मा, अमरनाथ महासचिव तनवीर अख्तर, सचिव मंडल के साथी फीरोज अशरफ खां, अंजनी कुमार शर्मा, इंद्र भूषण रमण ‘बमबम’ और कोषाध्यक्ष संजय सिन्हा ने उक्त आशय का संयुक्त बयान जारी किया गया है. जिसमेंये बातें कही गयी है. साथ ही बयान में आगे कहा गया है कि पूरे देशमें नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ चले आम जन, छात्रों, नौजवानों के आंदोलन को इप्टा अपना नैतिक समर्थन देती है और केंद्र सरकार द्वारा संख्या बल पर संविधान के खिलाफ कानून बनाने के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिरोध का आह्वान करती है. इप्टा इस असंवैधानिक कानून के खिलाफ आम जन के बीच ‘सिविल नाफरमानी’ के लिए जनता के बीच जायेगी और जनता को गोलबंद कर एक शांतिपूर्ण जनांदोलन के लिए वातावरण बनायेगी.

देशके विभिन्न विश्वविद्यालयों, शहरों में हो रहे जन प्रतिरोध के खिलाफ की जा रही पुलिसिया कार्रवाई, जुल्मो-सितम की इप्टा भर्त्सनाकरती है और देशकी तमाम संवैधानिक संस्थाओं से आमानवीय कृत्य के खिलाफ कठोर निर्णय लेने की अपील करती है. इप्टा का मानना है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम आम जन के खिलाफ है और भाजपा जान-बूझ कर इस अधिनियम को नागरिक अफरातरफी के बीच साम्प्रदायिक रंग देने में लगी है. इस अधिनियम से देशके कमजोर, पिछड़े और गरीब समुदाय पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा. यह अधिनियम विभाजनकारी है और देशको नफरत और हिंसा के गहरे अंधेरे में धकेलने वाला है.

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