कमाई के लिए जिंदगी ''खो'' रहे हैं घर छोड़ने वाले बच्चे

राजदेव पांडेय पटना : बिहार में माता-पिता के साथ कमाई के लिए अपने स्कूल की पढ़ाई छोड़कर ईंट-भट्टों पर काम करने वाले बच्चों (6-14 उम्र ) की संख्या अच्छी-खासी है. वर्ष 2018-19 में चिन्हित किये गये ऐसे बच्चों की संख्या 7000 से अधिक थी, लेकिन वर्ष सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षा विभाग इनमें से […]

राजदेव पांडेय
पटना : बिहार में माता-पिता के साथ कमाई के लिए अपने स्कूल की पढ़ाई छोड़कर ईंट-भट्टों पर काम करने वाले बच्चों (6-14 उम्र ) की संख्या अच्छी-खासी है. वर्ष 2018-19 में चिन्हित किये गये ऐसे बच्चों की संख्या 7000 से अधिक थी, लेकिन वर्ष सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षा विभाग इनमें से केवल 2605 बच्चों को ही दोबारा स्कूल पहुंचा सका. शेष 3152 बच्चे विभिन्न कारणों से वापस स्कूल नहीं पहुंचाये जा सके.
हालांकि इनकी स्कूली वापसी से पहले इन बच्चों को विभिन्न कामों में प्रशिक्षित किया गया. चालू शैक्षणिक सत्र में भी इस तरह के बच्चों के सर्वे के लिए अक्तूबर माह से फिर शुरू किया जाना है.
आधिकारिक जानकारी के मुताबिक प्रदेश में इंटर स्टेट माइग्रेशन लगातार बढ़ता जा रहा है. हालांकि शिक्षा विभाग केवल ईंट भट्टों पर काम करने वाले बच्चों को पहचान सका है. इस तरह के बच्चों का विस्थापन मौसमी प्रकृति का होता है. इसलिए इन पर हर समय नजर रखना संभव नहीं हो पा रहा है. हालांकि सर्वे से जुड़े एक्सपर्ट बताते हैं कि अपने माता पिता की लापरवाही के चलते ये बच्चे युवा स्थिति तक आते आते काम योग्य नहीं रह पाते. इन्हें कई बीमारियां घेर लेती हैं.
2018-19 में हुए सर्वे में ज्यादा पांच शहरों मसलन पटना में 950,वैशाली में 570,गया में 597,कटिहार में 530, किशनगंज में 500 बच्चे ईंट भट्टों पर मिले, जो स्कूल छोड़कर अपने माता पिता के साथ कमाई के लिए आये थे, हालांकि सर्वे में इनके माता पिता ने साफ इंकार कर दिया कि बच्चे यहां बाल श्रम करते हैं.
विस्थापित बच्चों को फिर स्कूल पहुंचाया गया-
वर्ष 2014-15 6608
2015-16 6681
2016-17 6027
2017-18 7148
2018-19 2605
2019-20 अक्तूबर में प्रस्तावित है
देरी से मिली राशि
भारत सरकार से सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्रति बच्चा 6000 रुपये मिलते हैं. हालांकि यह राशि बहुत देरी से मिलती है. पिछले साल ये राशि अक्तूबर की जगह जनवरी-फरवरी में मिली. इसलिए पिछले शैक्षणिक सत्र में प्रदेश में बेहद कम संख्या 2605 बच्चों को ही स्कूल भेजा जा सका. जबकि इस साल से पहले के सालों में औसतन 6 हजार से अधिक बच्चे स्कूल पहुंंचाये गये थे.

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