इंसानियत की मिसाल, ये डॉक्टर हैं कमाल

बिहार में जन्मे महान चिकित्सक डॉ बिधान चंद्र राय की जयंती व पुण्यतिथि दिवस एक जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे के रूप में मनाया जाता है. वास्तव में इस परंपरा की शुरुआत उन लोगों को सम्मान देने के िलए हुई थी, जोनि:स्वार्थ भाव से लोगों का जीवन बचाने के लिए उनकी सेवा कर रहे हैं, […]

बिहार में जन्मे महान चिकित्सक डॉ बिधान चंद्र राय की जयंती व पुण्यतिथि दिवस एक जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे के रूप में मनाया जाता है. वास्तव में इस परंपरा की शुरुआत उन लोगों को सम्मान देने के िलए हुई थी, जोनि:स्वार्थ भाव से लोगों का जीवन बचाने के लिए उनकी सेवा कर रहे हैं, और उनके लिए भी जो अपने कार्यों से चिकित्सीय पेशे का सम्मान बढ़ा रहे हैं. इनसे जुड़े कुछ लोगों के बारे में बता रहे प्रभात खबर रिपोर्टर अनुपम कुमार.
इनसे है पहचान
शहर में कई ऐसे डॉक्टर हैं, जिनसे दिखाने के लिए प्रदेश ही नहीं बल्कि झारखंड, ओड़िशा और नेपाल तक से मरीज आते हैं.
नंबर मिलना बड़ी बात
डॉ बीके अग्रवाल की पहचान प्रदेश के सबसे बड़े पेट के डॉक्टर के रूप में है, जिनसे इलाज करवाने के लिए प्रदेश भर के लोग पटना आते हैं. मरीजों की भीड़ इतनी कि परिजन रात दो बजे से ही नंबर के लिए लाइन में लगे रहते हैं. एक दिन में 20 नये मरीजों को ही डॉ. अग्रवाल देखते हैं, इसलिए इनका नंबर मिलना ही बड़ी बात होता है और कई लोगों को दो-तीन दिनों तक इसके लिए ही जद्दोजहद करना पड़ता है. लेकिन गैस्ट्रों और लीवर से संबंधित रोगों पर इनकी पकड़ ऐसी है कि लाइलाज बन चुके रोगों को भी ये ठीक कर देते हैं.
डॉक्टरों के डॉक्टर
मेडिका हार्ट इंस्टीट्यूट के वाइस चेयरमैन डॉ प्रभात कुमार को लोग डॉक्टरों के डॉक्टर के रूप में जानते हैं. इनसे इलाज के लिए न केवल आम लोगों की कई दिन लंबी क्यू लगी रहती है, बल्कि शहर के कई ख्यातिनाम चिकित्सक भी अपना इलाज इन्हीं से कराते हैं. पटना के आसपास के जिलों के साथ-साथ उत्तर बिहार से भी बड़ी संख्या में लोग इलाज के लिए आते हैं. इनके विनम्र व्यवहार के भी लोग कायल हैं. पटना से बाहर के बड़े कार्डियोलॉजिस्ट भी इनके प्रिसक्रीप्शन को बहुत सम्मान देते हैं.
जिनका कभी था नाम
शहर में कई डॉक्टर ऐसे भी हैं, जिनके यहां मरीजों की तो ऐसी भीड़ नहीं लगती, जैसी किसी जमाने में हुआ करती थी. लेकिन, आज भी बच्चे-बच्चे की जुबान से उनकी काबिलियत की चर्चा सुनी जा सकती है. वर्तमान में शहर के ज्यादातर बड़े डॉक्टर उनके शिष्य रहे हैं और उनके मुंह से भी गाहे-बगाहे उनकी तारीफ सुनी जा सकती है.
एलोपैथ पर भारी
होमियोपैथ डॉक्टरों की आम शिकायत रहती है कि लोग उन्हें वह सम्मान नहीं देते, जो एलोपैथ डॉक्टरों को मिलता है. लेकिन डॉ बी भट्टाचार्या इस मामले में अपवाद हैं. होमियोपैथ डॉक्टर होने के बावजूद उन्हें शहर में वह सम्मान हासिल है जो बड़े बड़े एलोपैथ डाॅक्टरों को भी नसीब नहीं होता. लोग उन्हें लाइलाज रोगों को भी दूर करने में सक्षम मानते हैँ. मरीज की उनके यहां इतनी भीड़ लगती है कि संख्या कम करने के लिए उन्होंने फीस बढ़ा कर दोगुना कर दी है. फिर भी उनके घर के सामने मरीज रतजगा करते दिख जाते हैं.
शिशु रोग की बड़ी सूझ
पटना शहर और आसपास के क्षेत्रों में ऐसे लोगों की आज भी कमी नहीं है जो मानते हैं कि डॉ उत्पल कांत की सूझ अदभूत है और बच्चे की सांस चल रही है तो वे उसे मरने नहीं देंगे. शिशु रोग चिकित्सा की कई आधुनिक तकनीकों का शहर में सबसे पहले उन्होंने ही इस्तेमाल किया और उन्हें इस क्षेत्र में अग्रदूत माना जाता है. उनकी लोकप्रियता का ही नतीजा हे कि नाला रोड में स्थित उनका क्लिनिक आसपास के क्षेत्रों के लिए एक लैंड मार्क बन गया है, जिसका उल्लेख लोग अपने घरों का पता बताने के लिए करते हैं.
न्यूरो चिकित्सा के पर्याय
पिछले चार दशकों से लगातार न्यूरो फिजिशियन के रूप में प्रैक्टिस करने के कारण शहर के ज्यादातर पुराने लोगों में डॉ गोपाल प्रसाद सिन्हा न्यूरो चिकित्सा के पर्याय बन चुके हैं. शहर ही नहीं बल्कि प्रदेश के विभिन्न जिलों और झारखंड से भी बड़ी संख्या में लोग उनसे इलाज कराने के लिए आते थे, जिसमें कई लाइलाज माने जाने वाले रोगी भी होते थे. अधिक उम्र के कारण अब डॉ सिन्हा का शरीर व दिमाग पहले की तरह साथ नहीं दे रहा .इसके बावजूद लोगों की उन पर इतनी आस्था है कि उनके क्लिनिक में भीड़ लगी रहती है.
लाइलाज का भी इलाज
डॉ एसएन आर्या की छवि शहर में ऐसे डॉक्टर की है जो लाइलाज समझे जाने वाले रोगों का भी कारगर इलाज करते हैं. जेनरल फिजिशियन होने की वजह से इनके पास हर तरह के रोगी इलाज के लिए आते हैं और ज्यादातर मामले क्रॉनिक डिजिज के होते हैं, जिनमें मरीजों को अन्य डॉक्टरों से लंबी चिकित्सा के बावजूद राहत नहीं मिली होती है. न्यूरो संबंधी रोगों पर भी डॉ आर्या की अच्छी पकड़ मानी जाती है. 80 वर्ष से अधिक आयु हो जाने के कारण अब डॉ आर्या क्लिनिक को कम समय देते हैं, फिर भी रोगियों की भीड़ लगी रहती है.
सर्जरी में जोड़ नहीं
डॉ नरेंद्र प्रसाद प्रदेश के सबसे बड़े सर्जन माने जाते हैं, जिनके सधे हाथों से की गयी चिकित्सा की मरीज और उनके परिजन दोनों कायल हैं. वर्तमान में शहर के बड़े सर्जन माने जाने वाले कई डॉक्टर पीएमसीएच सर्जरी विभाग में उनके छात्र रह चुके हैं जो आज भी उनकी तारीफ करते नहीं अघाते हैं. कई बार बड़ी दुर्घटना और वीवीआइपी मामलों में बिहार सरकार ने भी उनके इस दक्षता का इस्तेमाल किया है और एसकेएमसीएच व डीएमसीएच जैसे जगहों पर होने वाले ऐसे ऑपरेशनों के लिए उनको राजकीय हेलीकॉप्टर से भेजा गया है.
ग्लूकोमा के मास्टर
आम तौर पर साधन संपन्न लोग
प्राइवेट अस्पताल में इलाज करवाना पसंद करते हैं, लेकिन नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ विभूति पी सिन्हा की ख्याति ऐसी है कि बड़े-बड़े अधिकारी व पैसे वाले भी प्राइवेट नेत्रालयों को छोड़कर इनसे आंख दिखवाने आइजीआइएमएस आते हैं. अपने मेहनत से इन्होंने न केवल यहां क्षेत्रीय चक्षु संस्थान को खड़ा किया है बल्कि काबिलियत से उसे पूरे प्रदेश में एक प्रतिष्ठा भी दिलवायी है. ग्लूकोमा चिकित्सा के ये राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ और मास्टर माने जाते हैं और हर सोमवार इनके ग्लूकोमा क्लिनिक में दिखाने दूर दूर से लोग आइजीआइएमएस आते हैं.
अनुभव के कायल
डॉ मंजु गीता मिश्रा की छवि राजधानी के सबसे बड़े स्त्री और प्रसूति रोग विशेषज्ञों में से एक की है. प्रसव से संबंधित क्रिटिकल मरीज पटना के आसपास के जिलों से भी बड़ी
संख्या में इनके नर्सिंग होम में आते हैं. इनके चार दशक से अधिक लंबे अनुभव के लोग कायल है और जांच रिपोर्ट आने से पहले देख कर ही ये बहुत सारी बीमारियों की वजह समझ लेती हैं और उनका इलाज भी शुरू कर देती हैं. बहुत सारे लोग तो ऐसे भी हैं, जिनकी एक से अधिक पीढ़ियों का जन्म इनके ही नर्सिंग होम में हुआ है. ये आज भी उनकी तारीफ किये िबना नहीं रहते हैं.
सस्ता और सहज इलाज करने की बनायी छवि
डॉ एचएन दिवाकर को हड्डी और स्पाइन रोगों के बड़े डॉक्टरों में गिना जाता है. इनकी छवि एक ऐसे डॉक्टर की भी है जो महंगे जांच और इलाज में अनावश्यक नहीं उलझाता है और चिकित्सा करते समय मरीज के खर्च वहन क्षमता को भी ध्यान में रखता है. आर्थोपेडिक्स के लिए बनी राजवंशीनगर सुपर स्पेश्यिलीटी अस्पताल के निदेशक के रूप में इन्होंने कई वर्षों तक काम किया. सेवानिवृति के बाद भी सहज और सस्ता होने के कारण कई लोग इनसे ही इलाज करवाना चाहतेे हैं.
जिनकी पीढ़ियां विरासत को बढ़ा रहीं आगे
ऐसे तो शहर में हजारों डॉक्टर हैं, लेकिन कुछ ऐसे परिवार भी हैं, जिनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी भी लगातार शहर के लोगों को मेडिकल सुविधाएं दे रही है. इन्होंने अपने मां-बाप का नाम न केवल आगे बढ़ाया बल्कि कई ऐसी अत्याधुनिक इलाज की शुरुआत की है, जिसके लिए पहले लोगों को महानगरों का मुंह जोहना पड़ता था.
चार पीढ़ियां डॉक्टर, कुछ देश तो कुछ विदेश में नाम कमा रहे
प्रसिद्ध नाक, कान और गला रोग विशेषज्ञ डॉ बृजलाल के
परिवार की भी चार पीढ़ियां डॉक्टर हैं. उनके बाबा डॉ भगवान
दास दानापुर के प्रख्यात चिकित्सक थे. उनके पुत्र डॉ आरपी लाल को पटना गर्वमेंट डेंटल कॉलेज के पहले प्राचार्य बनने का श्रेय
है. डॉ बृजलाल के बड़े भाई डाॅ नंद लाल शहर के प्रसिद्ध दंत चिकित्सक थे. नंद लाल के बड़े पुत्र डॉ राजीव लाल हजारीबाग
डेंटल कॉलेज में प्रोफेसर हैं जबकि छोटे पुत्र डॉ संजीव लाल भी ओरल सर्जन हैं. बृजलाल के छोटे भाई स्व डा. मोहन लाल अमेरिका में फिजिशियन थे और भतीजा डॉ अभिनीत लाल पारस में इएनटी हेड है.
दादा होमियोपैथ विशेषज्ञ और पिता एलोपैथ डॉक्टर
प्रसिद्ध चर्म रोग विशेषज्ञ डॉ विकास शंकर के दादा गौरी शंकर प्रसाद होमियोपैथ विशेषज्ञ के रूप में प्रैक्टिस किया करते थे. उनके पिता डॉ शंकर प्रकाश माइक्रोबायोलाॅजी के बड़े डॉक्टर थे जिन्हें पीएमसीएच में माइक्रोबायोलॉजी विभाग को खड़ा करने का श्रेय है. वे इसमें 2004 से 2015 तक प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे. 2015 में सेवानिवृत होने के बाद से पुन: अपनी सेवा दे रहे हैं. उनके पुत्र विकास शंकर अभी एनएमसीएच के चर्म रोग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं और लेजर समेत चर्म रोगों की अत्याधुनिक चिकित्सा के बड़े विशेषज्ञ माने जाते हैं. उनके बड़े भाई आनंद शंकर और पत्नी मांडवी शंकर भी डाक्टर हैं.
पिता शिशु रोग, पुत्र को गैस्ट्रो सर्जरी में महारथ
आइजीआइएमएस के चिकित्सा अधीक्षक और प्रदेश के बड़े गैस्ट्रो सर्जन माने जाने वाले डॉ मनीष मंडल के पिता डॉ अरूण मंडल भी चिकित्सक हैं, जिन्हें शिशु रोगों पर अच्छी पकड़ के लिए मधेपुरा और उसके आसपास के क्षेत्रों में जाना जाता है. पीएमसीएच से 68 बैच के पास आउट डॉ अरुण प्रदेश के ऐसे गिने चुने चिकित्सकों में एक हैं, जिन्होंने वर्षों पटना शहर के सरकारी अस्पतालों में काम करने के बाद स्वेच्छा से ग्रामीण क्षेत्र में जाकर काम करना चुना और मधेपुरा चले गये. वहां किये जा रहे कई तरह के सामाजिक कार्यों के लिए भी यह परिवार चर्चित रहा है.
दंपतियों की गोद भरी
डॉ शांति राय का परिवार भी विरासत को आगे बढ़ा रहा है. वे स्वयं शहर की प्रसिद्ध गायनोकोलॉजिस्ट हैं. उनके पुत्र हिमांशु राय को आइवीएफ जैसी अत्याधुनिक तकनीक को शहर में सबसे पहले लाने का श्रेय है, जिसके लिए पहले लोगों को दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े महानगरों में जाना पड़ता था. कई नि:संतान दंपतियों की उन्होंने गोद भी भरी है. पुत्रवधू सारिका राय भी शहर की बड़ी गायनोकॉलोजिस्ट मानी जाती हैं, जिन्होंने कई क्रिटिकल सर्जरी सफलतापूर्वक की है.
चौथी पीढ़ी हो रही तैयार
डॉ राजेंद्र प्रसाद के नेत्र चिकित्सक रहे डॉ दुखन राम के परिवार की तीन पीढ़ियां डॉक्टर बन चुकी है. चौथी मेडिकल में पढ़ रही है. पद्मविभूषण दुखन राम के दोनों बेटे डॉ देवेंद्र राम और स्व. डॉ राजेंद्र राम डॉक्टर थे. डॉ देवेंद्र राम के पुत्र डॉ नीरज राम भी डॉक्टर हैं. स्व. डॉ राजेंद्र राम के पुत्र डाॅ अमित राम हजारीबाग डेंटल कॉलेज में प्रोफेसर और विभागाध्ययक्ष, ओरल सर्जरी हैं. उनकी पुत्री प्रियांशा राज जवाहर लाल मेडिकल कॉलेज, बेलग्राम से मेडिकल पढ़ रही है.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >