शोरूम के संचालक व वाहन मालिक परेशान
पटना : राज्य सरकार ने एक अप्रैल से सभी वाहनों में हाइ सिक्योरिटी नंबर प्लेट लगाना अनिवार्य कर दिया है. नियम के मुताबिक वाहन खरीदने के 48 घंटे के अंदर नंबर प्लेट वाहन के मालिक को उपलब्ध करना था, लेकिन प्रक्रिया ही शुरू नहीं होने से शोरूम के संचालक और वाहन मालिक दोनों परेशान हैं. हकीकत यह है कि 13 दिन बाद भी एक भी ग्राहक को हाइ सिक्योरिटी नंबर प्लेट नहीं मिला है.
एजेंसी ने शोरूम से वेबसाइट को नहीं किया लिंक : जानकारी के अनुसार अभी तक जिस एजेंसी को नंबर प्लेट बनाने के लिए अधिकृत किया गया है, उसने वाहन शोरूमों से वेबसाइट को लिंक ही नहीं किया है. पाटलिपुत्र हीरो के प्रबंधक अजय प्रधान ने कहा कि प्रावधान लागू होने के बाद नंबर प्लेट बनने का काम शुरू हो जाना चाहिए था. इस संबंध में संबंधित एजेंसी से संपर्क किया गया तो जवाब मिला.
लिंक जल्द कर दिया जायेगा. लेकिन अभी तक लिंक नहीं हुआ है. देनी टीवीएस के प्रमुख अमरजीत सिंह ने बताया कि नंबर अलॉट नहीं हो रहा है. किरण ऑटो मोबाइल्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक नितिन कुमार ने बताया कि जब तक कंपनी से नंबर प्लेट नहीं मिलेगा, तब तक नये ग्राहकों को कुछ दिन इंतजार करना होगा. श्रीगोपाल नेक्सा के सीइओ श्री प्रकाश ने बताया कि अगले सप्ताह से वाहन मालिकों को हाइ सिक्योरिटी नंबर प्लेट मिलना शुरू हो जायेगा.
…तो जाना पड़ सकता है जेल
अब वाहन जांच के दौरान वाहन पर हाइ सिक्योरिटी नंबर प्लेट नहीं लगी मिली, तो फाइन के साथ जेल भी जाना पड़ सकता है. हाइ सिक्योरिटी नंबर प्लेट एक विशेष प्रकार की नंबर प्लेट है, जिसे वाहन की सुरक्षा के लिए लगाया जाता है. इस नंबर प्लेट पर 11 डिजिट का अलग-अलग लेजर कोड नंबर फीड होता है. साथ में एक विशेष प्रकार का होलोग्राम भी चिपका होगा.
सात साल में भी नहीं बने पक्के मकान, चापाकल तक नहीं, लोग परेशान
पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र में सांसद तो कई बदले, लेकिन दशकों पुराने गर्दनीबाग के यारपुर स्लम की सूरत नहीं बदल सकी है. शहर के बीचोबीच इस स्लम में रहने वाले करीब पांच हजार से अधिक लोग वर्षों से मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं. इस स्लम तक प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान भी नहीं पहुंच सका है. बस्ती में जगह-जगह सामुदायिक शौचालय दो वर्षों से अाधे-अधूरे बने हुए हैं. बस्ती में रहने वाले लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं. पीने के पानी की भी बड़ी समस्या है.
केंद्र सरकार की राजीव आवास योजना के तहत यहां रहने वाले हर परिवार को पक्का मकान देना था. वर्ष 2012 में 439 आवासीय इकाई बनाने की योजना बनायी गयी. योजना पूरी करने की जिम्मेदारी बुडको को दी गयी. इस योजना को जनवरी, 2017 तक पूरा करना था, जिसे अब तक पूरा नहीं किया जा सका है. स्लम के लोग बताते हैं कि सरकार सिर्फ हवा-हवाई बातें करती है. निर्धारित समय से योजना पूरी हो गयी होती, तो आज झोंपड़ी में रहने को मजबूर नहीं होते. एेसे में जो नेता आवास और गंदगी की समस्या को दूर करेगा, उसी को हमारा वोट जायेगा.
2017 तक बनने थे आवास, अब तक नहीं बने
नावी चर्चा से दूर बस्ती के लोगों की अपनी ही जिंदगी है. शनिवार की दोपहर जब प्रभात खबर संवाददाता यारपुर स्लम बस्ती पहुंचे, तो कुछ लोग निर्माणाधीन आवासीय फ्लैट के समीप सजे खान-पान की दुकानों के पास बैठे थे. पूछताछ करने पर बस्ती के लोगों ने बताया कि हमसे नेता सिर्फ वोट मांगने पहुंचते हैं. वोट के बाद सांसद तो दूर विधायक भी कभी झांकने नहीं पहुंचे. इस चुनाव में हम उन्हीं उम्मीदवार को वोट देंगे, जो हमारी समस्याओं का निदान करेंगे.
चुनाव के समय ही नेता व कार्यकर्ता दिखाई देते है. चुनाव खत्म होने के बाद सांसद तो दूर विधायक भी देखने नहीं आते हैं. चुनाव में गरीबों के मुद्दे खूब उठाये जाते हैं. लेकिन, गरीबों की स्थिति जस-की-तस बनी रहती है.
चंदन राम, निवासी, यारपुर स्लम
टूटी-फूटी झोंपड़ी में
जीवन यापन कर रही हूं. पक्का घर मिलने वाला
है, जो वर्षों से निर्माणाधीन है. समय से मकान बना होता, तो दो वर्ष पहले ही पक्का मकान में रहने लगते. लेकिन, सरकार व प्रशासन आंख बंद किये हैं.
देवांती देवी, निवासी, यारपुर
यारपुर
स्लम में हजारों में लोग रहते हैं. लेकिन, इस बस्ती में पीने के पानी की समुचित व्यवस्था नहीं है. लोग सप्लाइ पानी पर निर्भर हैं. सप्लाइ पानी नहीं पहुंचा, तो फिर प्यासे रहने को मजबूर रहते हैं. यहां एक भी चापाकल नहीं है.
कुंदन, निवासी, यारपुर स्लम
हम गंदगी के बीच रहने को मजबूर हैं. सरकार हमारे उत्थान की बात करती है, जो सिर्फ घोषणाओं व फाइलों में सिमट कर रह जाती है. हकीकत यह है कि स्लम में शौचालय व पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी
नहीं हैं.
अजीत, निवासी, यारपुर स्लम
स्लम के लोग खुले में शौच नहीं करें, इसको लेकर दो वर्ष पहले सामुदायिक शौचालय बनाने की प्रक्रिया शुरू की गयी. लेकिन, प्रशासन के सुस्त रवैये की वजह से अब तक आधा-अधूरा ही बना है.
सोनू, निवासी, यारपुर
स्लम
