पटना : अज्ञानता व संशयों का नाश गुरु द्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त होने पर ही होता है. दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा रामकृष्णा नगर इलाके में आयोजित भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में शनिवार को आशुतोष महाराज की शिष्या मेरुदेवा भारती ने आगे कहा कि राजा परीक्षित असुरक्षा से ग्रस्त थे क्योंकि उनके समक्ष हर क्षण मौत मुंह बाये खड़ी रहती थी.
उन्होंने भागवत कथा श्रवण की, पर परीक्षित की मुक्ति केवल हरि चर्चा या कृष्ण लीलाओं का श्रवण करने मात्र से नहीं हुई, अपितु पूर्ण गुरु श्री सुखदेव जी महाराज के द्वारा प्रभु के तत्व रूप को अपने अंदर जान लेने पर हुई.
भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के मोह व मोहजनित संशय नष्ट करने हेतु उससे भी कहा था कि मैं तुझे दिव्य चक्षु प्रदान करता हूं. दिव्य चक्षु से परमात्मा के शास्वत स्वरूप का दर्शन करते ही उसकी समस्त दुर्बलताएं ऐसे विलीन हो गयी, जिस प्रकार सूर्य के उदित होने पर कुहासा छंट जाता है. राजा परीक्षित को भी ब्रह्म ज्ञान प्रदान कर सुखदेव ने मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया था. समापन दिवस के दिन रूक्मिणी विवाह के प्रसंग का उल्लेख भी भारती ने किया.
इस प्रसंग में उन्होंने रूक्मिणी रूपी जीवात्मा का प्रभु प्रियतम के प्रति विरह दर्शाया. साथ ही, प्रकट किया गया कि कैसे इस आत्मा की पुकार पर परम आत्मा प्रभु उसे समस्त बंधनों से स्वतंत्र कर कभी न टूटने वाले प्रणय सूत्रों में बांध लेते हैं.
