पटना : शहर के स्पीड ब्रेकर लोगों को रोगी बना रहे हैं. बिना मानक के बड़ी संख्या में बने स्पीड ब्रेकरों का झटका रीढ़ से लेकर गर्दन तक की हड्डियों को कमजोर कर रहा है. डॉक्टरों के अनुसार इन लगातार लगने वाले झटकों से लोग हड्डी रोग के साथ-साथ लकवा जैसी बीमारियों के भी शिकार होने लगे हैं. बड़ी संख्या में ऐसे मरीज अस्पताल में पहुंच रहे हैं.
शहर के स्पीड ब्रेकरों की वजह से स्लिप डिस्क और लकवे तक का खतरा
पटना : शहर के स्पीड ब्रेकर लोगों को रोगी बना रहे हैं. बिना मानक के बड़ी संख्या में बने स्पीड ब्रेकरों का झटका रीढ़ से लेकर गर्दन तक की हड्डियों को कमजोर कर रहा है. डॉक्टरों के अनुसार इन लगातार लगने वाले झटकों से लोग हड्डी रोग के साथ-साथ लकवा जैसी बीमारियों के भी शिकार […]

ये हैं स्पीड
ब्रेकर के मानक
n स्पीड ब्रेकर की ऊंचाई 10 सेमी, लंबाई 3.5 मीटर और वृत्ताकार क्षेत्र का दायरा 17 मीटर होना चाहिए
n ड्राइवर को सचेत करने के लिए स्पीड ब्रेकर आने से 40 मीटर पहले ही चेतावनी बोर्ड लगा होना चाहिए
n स्पीड ब्रेकरों पर थर्मोप्लास्टिक पेंट की पट्टियां लगवानी चाहिए, ताकि रात में चालक को ब्रेकर आसानी से दिखायी दे
n स्पीड ब्रेकर की समय-समय पर निगरानी की जानी चाहिए
n अगर गली मोहल्ले के लोग अपनी मर्जी से स्पीड ब्रेकर बना लें तो नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए
शहर में स्पीड ब्रेकर बनाने के नियम ताक पर
100 में से 15 ऐसे मरीजों की बीमारी की वजह स्पीड ब्रेकर है
झटके से रीढ़ की हड्डियों को नुकसान
राजधानी पटना में बने ज्यादातर स्पीड ब्रेकर बड़े और उबड़-खाबड़ हैं. वाहन की रफ्तार धीमी होने पर भी इनसे गुजरने पर झटका लगता है. एनएमसीएच के स्पाइन सर्जन डॉ महेश प्रसाद का कहना है कि रीढ़ की हड्डी के क्षतिग्रस्त होने वाले अधिकांश केस में स्पीड ब्रेकर मुख्य वजह माने जा रह हैं. डॉ महेश कहते हैं, इसके शिकार लोगों को शुरुआत में कमर व गले में हल्का दर्द होता है. उस वक्त लोग इस परेशानी की वजह ही नहीं समझ पाते हैं. कुछ समय बाद रीढ़ की हड्डी कमजोर होने, हड्डियों में गैप आने से पीठ में तेज दर्ज होने लगता है. नसों के क्षतिग्रस्त होने पर समस्या गंभीर रूप ले लेती है.
कमर से गर्दन तक दर्द
फिजियोथेरेपिस्ट डॉ राजीव कुमार सिंह के मुताबिक मोटर साइकिल के बड़े पहिये होने के कारण चालक को स्पीड ब्रेकर पर कम झटका लगता है. बड़ी कार भी इस झटके से बच जाते हैं. लेकिन छोटे पहिये वाली गाड़ी जैसे स्कूटर, स्कूटी आदि में ज्यादा तकलीफ होती है. इसका असर पैर से होते हुए कमर व हाथों से होते हुए गर्दन पर पहुंचता है. समय पर इलाज नहीं करने पर लकवे का भी खतरा रहता है.
बार-बार का झटका खतरनाक
डॉ महेश ने कहा कि स्पीड ब्रेकर के झटके से पीड़ित मरीजों में अधिकांश को स्लिप डिस्क की समस्या हो जाती है. इस समस्या में डिस्क स्पाइनल कॉर्ड से हटकर थोड़ा बाहर आ जाता है. डिस्क का बाहरी हिस्सा एक मजबूत झिल्ली से बना होता है और बीच में तरल जेलीनुमा पदार्थ भरा रहता है. यह पदार्थ दो डिस्क को आपस में घर्षण से बचाता है. स्पीड ब्रेकर से बार-बार लगने वाले झटके से यह जेलीनुमा पदार्थ बाहर आ जाता है. इसके बाद स्पाइनल कार्ड पर दबाव बढ़ने लगता है और दर्द होने लगता है.