फुलवारीशरीफ : 200 वीं खप्पर पूजा आज, मंदिर सज-धज कर तैयार

फुलवारीशरीफ : फुलवारीशरीफ के देवी स्थान मंदिर में हो रही श्रावणी पूजा को सिलसिले में रविवार की संध्या 7ः 30 बजे खप्पर पूजा (डाली पूजा) निकाली जायेगी. इसको लेकर मंदिर परिसर को भव्य रूप सजाया गया है. खप्पर पूजा यानी डाली पूजा की शुरुआत 1818 में हुई थी. मान्यता यह है कि दो सौ साल […]

फुलवारीशरीफ : फुलवारीशरीफ के देवी स्थान मंदिर में हो रही श्रावणी पूजा को सिलसिले में रविवार की संध्या 7ः 30 बजे खप्पर पूजा (डाली पूजा) निकाली जायेगी. इसको लेकर मंदिर परिसर को भव्य रूप सजाया गया है.
खप्पर पूजा यानी डाली पूजा की शुरुआत 1818 में हुई थी. मान्यता यह है कि दो सौ साल पहले शहर में भयंकर महामारी फैली थी. इसमें सैकड़ों लोगों की जानें चली गयी थीं. मंदिर के पुजारी झमेली बाबा को सपना आया कि पूजन-हवन के बाद उसकी आग खप्पर में लेकर पूरे शहर की परिक्रमा करने से महामारी दूर हा जायेगी. तब से हर साल सावन के महीने में शहर के संगत पर स्थित मां काली मंदिर देवी स्थान से भव्य पूजन के बाद मंदिर के पुजारी खप्पर में हवन की अग्नि लेकर मंदिर से शहर की परिक्रमा करने के लिए निकलते हैं.
इस दौरान पुजारी के पीछे-पीछे हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ माता के जयकारे लगते हुए परिक्रमा में शामिल होती है. इस परिक्रमा में श्रद्धालुओं हाथों में पारंपरिक हथियार भाला, तलवार,लाठी, त्रिशूल आदि होते हैं. ऐसा कहा जाता है कि शुरू में मंदिर के पुजारी खप्पर को दूसरे गांव में रख देते थे, जिसको लेकर विवाद होने लगा.
सच्चे मन से मांगी गयी हर मनोकामना होती है पूर्ण
सात देवियों की प्रतिमा स्थापित कर बनाया मंदिर
इसके बाद संगत पर सात देवियों की प्रतिमा स्थापित कर भव्य मंदिर बनाया गया. इसी मंदिर परिसर में भैरव बाबा, गौरैया बाबा और विघ्न माता की स्थापना हुई. तबसे लेकर आज तक यह परंपरा चली आ रही है. जबसे खप्पर पूजा निकल रही तबसे आज तक फुलवारीशरीफ और आसपास के इलाकों में महामारी नहीं हुई है. पूजा समिति के सचिव देवेंद्र प्रसाद कहते हैं कि इस मंदिर में सच्चे मन से मांगी गयी हर मनोकामना पूरी होती है.

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