पुलिस अपने बचाव में तुरंत प्राथमिकी दर्ज कर लेती है, पर आम लोगों को लगवाती है चक्कर

आम जनता को परेशान करना पुलिस की आदत सी बन गयी है पटना : हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि बिहार पुलिस अपने बचाव में तो प्राथमिकी तुरंत दर्ज कर लेती है लेकिन अगर आम पब्लिक अपनी प्राथमिकी दर्ज कराने जाती है तो पुलिस द्वारा उसे तरह-तरह से परेशान […]

आम जनता को परेशान करना पुलिस की आदत सी बन गयी है
पटना : हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि बिहार पुलिस अपने बचाव में तो प्राथमिकी तुरंत दर्ज कर लेती है लेकिन अगर आम पब्लिक अपनी प्राथमिकी दर्ज कराने जाती है तो पुलिस द्वारा उसे तरह-तरह से परेशान किया जाता है. प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए लोगों को अदालत की शरण में जाना पड़ता है. अदालत का कहना था कि पुलिस द्वारा आम जनता को परेशान करने की आदत सी बन गयी है. कोर्ट ने कहा कि वरीय पुलिस पदाधिकारियों को चाहिए इस तरह के मामले सामने आने पर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है.
न्यायाधीश डॉ रवि रंजन और न्यायाधीश एस कुमार की खंडपीठ ने पूर्णिया के पार्षदों के अपहरण से संबंधित मामले की सुनवाई करते हुए उक्त टिप्पणी की. खंडपीठ का कहना था कि दोनों पार्षदों ने निचली अदालत में दिये अपने बयान में कहा है कि वे अपनी-अपनी मर्जी से अपने रिश्तेदार के यहां घूमने गये थे. किसी भी व्यक्ति ने जबरदस्ती उन्हें बंधक नहीं बनाया
था और न ही उनका अपहरण किया गया था.
दोनों पार्षद अपने-अपने अधिवक्ता के माध्यम से पिछली सुनवाई पर अदालत में उपस्थित हुए थे. इन पार्षदों के घर से गायब होने के बाद दोनों पार्षदों के परिवारजनों के द्वारा हाईकोर्ट में दो अलग-अलग आपराधिक रिट याचिकाएं दायर कर उन्हें बरामद करने का अनुरोध किया गया था. पूर्वमें सुनवाई करते हुए अदालत ने इस मामले कीगंभीरता को देखते हुए इसकी जांच का जिम्मा राज्य के डीजीपीको दिया था .
डीजीपी ने इस मामले की जांच का जिम्मा डीआईजी को दे दिया. हालांकि, अदालत में डीजीपी की कार्यशैली पर भी सवाल उठाते हुए कहा, जब इस मामले की जांच का जिम्मा उन्हें दिया गया था और उन्हें इसकी रिपोर्ट अदालत में करना था तब इस मामले को जांच के लिए डीआईजी को देने का कोई सवाल ही नहीं था.
इस मामले में अदालत ने पूर्णिया पुलिस के साथ बिहार पुलिस की कार्यशैली पर भी सवाल उठाते हुए कहा की एफआईआर कराने में आम जनता को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है. आखिर पुलिस अपनी ड्यूटी करने में पीछे क्यों रहती है? अदालत ने कहा कि इस मामले में एफआईआर दर्ज करने के लिए कोर्ट का सहारा क्यों लेना पड़ा. आखिर ऐसा क्यों हुआ पुलिस ने अपना कार्य नहीं किया. अदालत ने राज्य सरकार से सवाल किया कि किसी भी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस फौरन प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं करती है.
आम जनता को प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कोर्ट का सहारा क्यों लेना पड़ता है? क्या यह पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है की अगर आम जनता प्राथमिकी दर्ज करने जाती है, तो उसे दर्ज की जाये. क्या इस बात की जानकारी वरीय पुलिस पदाधिकारियों को नहीं होती है?

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