पटना : फाइलों में अटकी दानापुर-किऊल की आरआरआई योजना

मैनुअल मेमो देने की वजह से पांच से दस प्रतिशत ट्रेनें हो रही हैं विलंब पटना : दानापुर रेल मंडल क्षेत्र की मुख्य रेल लाइन पर स्थित दानापुर और किऊल स्टेशन पर एक साल पहले रूट रिले इंटरलॉकिंग (आरआरआई) सिस्टम इंस्टॉल करने की योजना बनायी गयी. लेकिन आरआरआई योजना अब तक फाइलों में अटकी हुई […]

मैनुअल मेमो देने की वजह से पांच से दस प्रतिशत ट्रेनें हो रही हैं विलंब
पटना : दानापुर रेल मंडल क्षेत्र की मुख्य रेल लाइन पर स्थित दानापुर और किऊल स्टेशन पर एक साल पहले रूट रिले इंटरलॉकिंग (आरआरआई) सिस्टम इंस्टॉल करने की योजना बनायी गयी. लेकिन आरआरआई योजना अब तक फाइलों में अटकी हुई है.
आरआरआई सिस्टम इंस्टॉल नहीं होने की वजह से ट्रेनों का परिचालन मैनुअल कराया जा रहा है. इससे रोजाना पांच से दस प्रतिशत एक्सप्रेस व पैसेंजर ट्रेनें विलंब हो रही है. रेलमंडल अधिकारी की मानें तो आरआरआई को लेकर दोनों स्टेशनों पर केबिन बन कर तैयार है और सिर्फ केबलिंग का काम किया जाना है.
1200 किलोमीटर ऑप्टिकल केबल की है जरूरत : दानापुर स्टेशन पर आरआरआई सिस्टम इंस्टॉल करने को लेकर 1200 किलोमीटर ऑप्टिकल केबल की जरूरत है. लेकिन पूर्व
मध्य रेल के सप्लायर ऑप्टिकल केबल सप्लाइ नहीं कर रहा है, जिससे आरआरआई का काम रुका पड़ा है. दानापुर स्टेशन पर आरआरआई
सिस्टम नहीं होने की वजह से बिहटा से लेकर नेऊरा तक हर सेक्शन में ट्रेनें
रुकी रहती है और इन्हें एक-एक
कर पास कराया जाता है. यही वजह है कि नेऊरा से पटना जंक्शन पहुंचने में कभी-कभी एक से दो घंटे का
समय लग जाता है. यही स्थिति किऊल स्टेशन की भी है.
ट्रेनों का दबाव अधिक होने से ज्यादा परेशानी
रेलमंडल की मुख्य रेल लाइन पर दानापुर व किऊल स्टेशन है. इन दोनों स्टेशनों से रोजाना गुजरने वाली ट्रेनों की संख्या 100 जोड़ी से अधिक है, जिसमें एक्सप्रेस, इंटरसिटी और पैसेंजर ट्रेनें शामिल है. वहीं, किऊल स्टेशन पर 47 जोड़ी और दानापुर स्टेशन पर 56 जोड़ी ट्रेनों की ठहराव सुनिश्चित की गयी है. लेकिन ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम यानी आरआरआई की सुविधा नहीं है. इससे स्टेशन पर रुकने वाली ट्रेनों के लोको पायलट को मैनुअल मेमो दिया जाता है और मैनुअल ट्रैक बदला जा रहा है. क्या है आरआरआई
आरआरआई अर्थात रूट रिले इंटरलॉकिंग जिसे रेलवे का दिमाग भी कहा जाता है. आरआरआई असल में रेलवे स्टेशन पर स्थित वह कमरा है, जहां सैकड़ों केबल और हजारों की संख्या में सर्किट एक जगह जुड़े होते हैं और एक ही जगह से ट्रेनों के परिचालन पर नजर रहती है.
इसकी जटिलता के कारण एक छोटी खराबी को दूर करने में भी घंटों का समय लग जाता है. पहले कोई बैकअप सिस्टम न होने के कारण इसके खराब होने पर मैनुअली ट्रेनों संचालन किया जाता था, जिसमे मेमो के जरिये ट्रेनों का संचालन किया जाता था. मेमो के जरिये हर स्टेशन पर ड्राइवर को क्लीयरेंस लेनी पड़ती है, जिसके कारण ट्रेनों की गति पर भी असर पड़ता है और दुर्घटना होने की भी ज्यादा संभावनाएं होती हैं.

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