कभी परिवार के भरण-पोषण और बच्चों की पढ़ाई के खर्च को लेकर आर्थिक तंगी से जूझ रहीं गोविंदपुर प्रखंड की निभा कुमारी आज आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ रही हैं. जीविका के स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने अपनी आमदनी बढ़ाने के साथ परिवार की आर्थिक स्थिति को भी बेहतर किया है.
2020 में स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं
गोविंदपुर गांव निवासी निभा कुमारी, पति धर्मेंद्र कुमार, वर्ष 2020 में लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं. इससे पहले परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी. परिवार में पति-पत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी हैं. पति की सीमित आमदनी में परिवार का खर्च चलाने के साथ बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल था. परिवार के पास रोजगार शुरू करने के लिए कोई पूंजी भी नहीं थी.
20 हजार रुपये के ऋण से शुरू की श्रृंगार की दुकान
समूह से जुड़ने के बाद निभा कुमारी ने अपनी परिस्थितियों को बदलने की दिशा में प्रयास शुरू किया. उन्होंने स्वयं सहायता समूह से 20 हजार रुपये का ऋण लेकर छोटे स्तर पर श्रृंगार सामग्री की दुकान शुरू की. धीरे-धीरे दुकान चलने लगी और इससे परिवार की आमदनी में सुधार होने लगा.
50 हजार रुपये का ऋण लेकर शुरू किया पार्लर
दुकान से मिले अनुभव और बढ़ती आमदनी से निभा कुमारी का आत्मविश्वास बढ़ा. इसके बाद उन्होंने समूह से 50 हजार रुपये का ऋण लेकर सिलाई मशीन खरीदी और पार्लर का काम भी शुरू किया. सिलाई, पार्लर और श्रृंगार सामग्री की दुकान से होने वाली आमदनी ने परिवार की आर्थिक स्थिति को और मजबूत किया.
अब करीब 21 हजार रुपये प्रतिमाह की आमदनी
आज निभा कुमारी मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर करीब 21 हजार रुपये प्रतिमाह तक की आमदनी कर रही हैं. बढ़ी हुई आमदनी से वह अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के साथ परिवार की जरूरतों को भी पूरा कर पा रही हैं. कभी आर्थिक तंगी से जूझ रहा परिवार अब आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
जीविका के सहयोग से बढ़ा आत्मविश्वास
निभा कुमारी की कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन, समूह से मिलने वाली आर्थिक सहायता और खुद कुछ करने का दृढ़ संकल्प महिलाओं को अपनी परिस्थितियां बदलने में मदद कर सकता है. जीविका के माध्यम से मिले सहयोग से उन्हें आर्थिक मजबूती के साथ आत्मविश्वास भी मिला है.
क्या कहते हैं जीविका बीपीएम
जीविका बीपीएम निवास शर्मा ने कहा कि स्वयं सहायता समूह महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है. समूह के माध्यम से महिलाओं को बचत, ऋण और स्वरोजगार से जुड़ने का अवसर मिलता है. निभा कुमारी ने समूह से मिले ऋण का सदुपयोग कर अपने लिए रोजगार के अवसर तैयार किए और आज आत्मनिर्भर बनकर परिवार को आगे बढ़ा रही हैं. ऐसी सफलता की कहानियां अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार के लिए प्रेरित करती हैं.
