अभेद्य किले में अपने ही सुरक्षा गार्ड की धोखेबाजी: 29 साल बाद भुटकुन शुक्ला के कातिल दीपक को उम्रकैद

बिहार के चर्चित भुटकुन शुक्ला हत्याकांड में 29 साल बाद फैसला आया है। अदालत ने दोषी दीपक कुमार सिंह को आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई है।

​ Bhutkun Shukla Murder: वैशाली का खंजाहाचक गांव—एक ऐसा अभेद्य किला जहां परिंदा भी भुटकुन शुक्ला की मर्जी के बिना पर नहीं मार सकता था. नारायणी नदी की गोद में बसे इस सुरक्षित ठिकाने को नापना पुलिस और दुश्मनों दोनों के लिए नामुमकिन माना जाता था. लेकिन 16 जुलाई 1997 की उस खूनी सुबह अंडरवर्ल्ड का एक ऐसा चक्रव्यूह रचा गया, जिसने इस सुरक्षित किले में ही उनके हत्याकांड को अंजाम देकर फरार हो गया. 29 साल लंबे इंतजार के बाद मुजफ्फरपुर की अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-10 की अदालत ने इस सनसनीखेज हत्याकांड में मुख्य आरोपी दीपक कुमार सिंह को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है.

विरोधी गुट की गहरी चाल: सुरक्षा घेरे में यूं दाखिल हुआ 'आस्तीन का सांप'

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक यह महज एक अचानक हुई हत्या नहीं, बल्कि एक सोची-समझी खूनी साजिश थी. भुटकुन शुक्ला के राजनीतिक और आपराधिक विरोधियों ने साल 1995 में ही दीपक कुमार सिंह को उनके सुरक्षा घेरे में 'प्लांट' कर दिया था. दीपक ने बेहद शातिर तरीके से दो सालों तक वफादारी का नाटक कर उनका का अटूट विश्वास जीता और उसके सुरक्षा चक्र की सबसे मजबूत कड़ी बन गया.

जो सुरक्षा कवच था, वही बना मौत का जाल

खंजाहाचक गांव की भौगोलिक बनावट ही भुटकुन की सबसे बड़ी ताकत थी. किसी भी खतरे की आहट पर नारायणी नदी पार कर उत्तर प्रदेश की सीमा में गायब हो जाना उनके गिरोह का पुराना पैंतरा था. साथ रहते-रहते कातिल दीपक इस अभेद्य किले के हर चोर रास्ते और गुप्त मोड़ से वाकिफ हो चुका था. उसे यह भी पता था कि भुटकुन की रोजाना की दिनचर्या क्या है.

पूजा और रिवॉल्वर की सफाई के बीच गूंजी एके-47 की तड़तड़ाहट

घटना के चंद दिनों पहले ही भुटकुन ने अपने बड़े बेटे का जन्मदिन मनाये थे. 16 जुलाई की सुबह नदी में स्नान करने के बाद भुटकुन हमेशा की तरह अपने हथियारों की पूजा और सफाई कर रहे थे. जैसे ही उन्होंने अपनी ऑटोमेटिक रिवॉल्वर को पुर्जे अलग करने के लिए खोला, घात लगाए दीपक को वो मौका मिल गया जिसका उसे दो साल से इंतजार था. इससे पहले कि भुटकुन संभल पाते, दीपक की एके-47 ने आग उगल दी. गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा इलाका दहल उठा. सबसे बड़े विश्वासपात्र अंगरक्षक के ही हाथों उनकी हत्या की खबर सुनते ही आसपास के लोग सन्न हो गये. वारदात के बाद दीपक उन्हीं गुप्त चोर रास्तों का इस्तेमाल कर हवा में गायब हो गया, जिनसे कभी भुटकुन अपनी जान बचाकर भागते थे.

29 साल बाद न्यायिक मुहर: अदालत का कड़ा फैसला

लालगंज थाना कांड संख्या 100/1997 में लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने दीपक कुमार सिंह को सजा सुनाई:

  • आईपीसी की धारा 302: अभियुक्त दीपक कुमार सिंह को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा.
  • आर्म्स एक्ट की धारा 27(1): अवैध हथियार के इस्तेमाल में 3 वर्ष का सश्रम कारावास और 5 हजार रुपये का जुर्माना.

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लेखक के बारे में

By Premanshu shekhar

I have 16 years of journalism experience, working as a Bureau Chief at Prabhat Khabar muzaffarpur. My writing focuses on crime,political, social, and current topics.I have experience covering assembly and parliamentary elections reporting.
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