केवल नामांकन शुल्क का फंड ही विश्वविद्यालय के पास एकमात्र विकल्प
मुंगेर. मुंगेर विश्वविद्यालय के पोर्टल पर पेमेंट गेटवे संचालन करने वाली एजेंसी को भले ही विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रक्रियाओं में लाखों-करोड़ों की आमदनी हो रही हो, लेकिन मूलभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहे एमयू के अंगीभूत एवं संबद्ध कॉलेजों के लिये फंड की परेशानी ही सबसे बड़ी समस्या है. हलांकि कॉलेजों के पास नामांकन शुल्क के रूप में फंड भले ही आ रहा हो, लेकिन सरकार द्वारा छात्राओं एवं एससी-एसी वर्ग के विद्यार्थियों के नामांकन शुल्क माफी का नियम कॉलेजों के लिये फंड की कमी को बढ़ा रहा है. इसमें सबसे बुरी हालत एमयू के लगभग 17 संबद्ध कॉलेजों की है, जिसे नामांकन शुल्क में मिली राशि से ही न केवल विद्यार्थियों की आंतरिक परीक्षा लेनी पड़ती है, बल्कि कॉलेज का संचालन भी किया जाता है.बता दें कि एमयू के अंतर्गत पांच जिले मुंगेर, लखीसराय, जमुई, खगड़िया और शेखपुरा में कुल 34 अंगीभूत एवं संबद्ध कॉलेज संचालित हैं. वहीं सरकार से विश्वविद्यालय को जहां लंबे समय से फंड नहीं मिल रहा है. वहीं इन कॉलेजों को भी कोई खास सरकारी फंड नहीं मिल रहा. हलांकि कॉलेजों को विद्यार्थियों के नामांकन के दौरान लिया जाने वाला नामांकन शुल्क मिलता है, लेकिन इसमें भी एमयू के कॉलेजों से दूर हो रहे विद्यार्थियों की संख्या के कारण प्रत्येक सत्र में कॉलेज में अधिकांश सीटें रिक्त रह जा रही है. हद तो यह है कि इसमें भी सरकार द्वारा छात्रा व एससी-एसटी वर्ग के विद्यार्थियों का नामांकन शुल्क पूरी तरह माफ कर दिया गया है. जिससे कॉलेजों को कुल नामांकन की अपेक्षा आधे विद्यार्थियों का ही नामांकन शुल्क मिलता है.
फंड के अभाव में परेशानी से जूझ रहे कॉलेज
छात्रा व एससी-एसटी वर्ग के विद्यार्थियों का नामांकन शुल्क पूरी तरह माफ होने के कारण एमयू के कॉलेजों के पास फंड की कमी सबसे बड़ी परेशानी है. हाल यह है कि नामांकन शुल्क के रूप में मिले राशि से ही कॉलेजों को जहां आंतरिक परीक्षाओं के दौरान विद्यार्थियों को प्रश्न पत्र देना पड़ता है. वहीं कॉलेज के शैक्षणिक व आधारभूत संरचनाओं के विकास का कार्य करना पड़ता है. इसमें न केवल कॉलेज के लाइब्रेरी व प्रयोगशालाएं शामिल है, बल्कि कॉलेजों को इन राशि से ही अधिकांश कार्य करना होता है. इसमें सबसे बड़ी मुसीबत महिला कॉलेजों के लिये हैं. जिनके पास नामांकन शुल्क के रूप में न कोई राशि मिलती है और न ही महिला कॉलेजों को लंबे समय से सरकार से इसके लिये क्षतिपूर्ति राशि मिली है. हद तो यह है कि एमयू के अंतर्गत कुल 17 संबद्ध कॉलेज आते हैं. जिसे अपने शैक्षणिक व आधारभूत संरचनाओं के साथ अपने शिक्षकों का वेतन भी अपने आंतरिक फंड से ही देना होता है.
एकेडमिक सीनेट के दौरान उठा था मुद्दा
बता दें कि एमयू में 12 सितंबर को एकेडमिक सीनेट की बैठक के दौरान भी इसे लेकर मुद्दा सीनेट सदस्यों द्वारा उठाया गया था. जिसमें कहा गया था कि विश्वविद्यालय द्वारा कॉलेजों को आंतरिक परीक्षा के दौरान प्रश्नपत्र उपलब्ध नहीं कराया जाता है. जिसका सारा खर्च कॉलेज प्रबंधन को वहन करना पड़ता है. इतना ही नहीं इस दौरान सीनेट सदस्यों द्वारा इसे लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन को ध्यान देने तथा कॉलेजों को आंतरिक परीक्षा के दौरान प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया था.
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