मुंगेर : सुरक्षित पेयजल आज एक बहस का मुद्दा बन गया है. विकास के इस मॉडल ने पूरे भू-जल को दूषित कर रखा है. प्रदूषित जल की श्रेणी में मुंगेर का नाम पूरे सूबे में चर्चित है. इस चर्चा के केंद्र में जहां मुंगेर का खैरा है,
वहीं दूसरी ओर गंगा के किनारे का क्षेत्र. सबसे हैरत की बात तो यह है कि यहां जल में प्रदूषित तत्वों की जांच के लिए लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के अधीन एक प्रयोगशाला कार्यरत है. यह प्रयोगशाला कभी खुलता है तो कभी बंद रहता है. अगर लोग पानी का सेंपल लेकर जांच कराने यहां पहुंचते हैं तो उसे बैरंग ही वापस लौटना पड़ता है.
क्योंकि प्रयोगशाला अधिकांश तौर पर बंद ही रहते है. अगर पानी का सेंपल भी ले लिया जाय तो महीनों जांच रिपोर्ट लेने के लिए प्रयोगशाला का चक्कर लगाना पड़ता है. 2009 में खुला था प्रयोगशाला 2 फरवरी 2009 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रमंडलीय मुख्यालय मुंगेर के लाल दरवाजा क्षेत्र में जल प्रयोगशाला का उद्घाटन किया था.
प्रयोगशाला खोले जाने का मकसद यह रहा है कि भू-जल के दूषित तत्वों की जांच की जाय और उसे चिह्नित किया जा सके. प्रयोगशाला के आरंभ हुए पांच साल से अधिक बीत गये. लेकिन इसे आवश्यक संसाधन तक मुहैया नहीं कराया गया. एक केमिस्ट के भरोस प्रयोगशाला प्रयोगशाला में संसाधनों का टोटा है. यह प्रयोगशाला मात्र एक केमिस्ट के भरोसे चल रहा है.
जबकि प्रावधान के मुताबिक यहां एक सहायक केमिस्ट, कंप्यूटर ऑपरेटर और आदेशपाल की व्यवस्था होनी चाहिए. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो पाया है. प्रयोगशाला की लचर स्थिति रहने के कारण न तो मुंगेर के जल श्रोत को चिह्नित किये जा सके हैं और न ही वैसे पानी की पहचान हुई जो पीने लायक है या नहीं. लिहाजा लोग अनजाने में दूषित जल का इस्तेमाल करते है और जल जनित तरह-तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे है.
नहीं मिलता है चापाकल में निशान प्रावधान के मुताबिक विभिन्न चापाकल, कुंआ से जल का नमूना एकत्र करना और उसे आवश्यक प्रपत्र में भर कर जांच कर पूरी समेकित रिपोर्ट विभाग को देनी है. ताकि विभाग अपने स्तर से दूषित जल के स्तर को कम करने या फिर उसे स्वच्छ करने में कारगर भूमिका अदा कर सके. ऐसा यहां कुछ नहीं दिख रहा है.
न ही कोई समेकित अध्ययन किया गया है. जिले में पीएचइडी विभाग या प्राइवेट स्तर से सैकड़ों चापाकल लगे हैं. लेकिन कौन चापाकल का पानी पीना है और किस चापाकल का नहीं कोई डिमार्ककेशन नहीं किया गया है. राशि का हुआ बंटाधार इतना ही नहीं दूषित जल की जांच के लिए सरकार ने 10 वर्ष पहले पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित किया था साथ ही उसे पानी जांच के लिए आवश्यक कीट भी मुहैया कराये गये थे. उस योजना का तो कहीं कोई अता-पता नहीं है.
पर लाखों रुपये का बंटाधार हो गये. अनजाने में बीमारी को लगा रहे गले मुंगेर के भू-जल में आइरन, आर्सेनिक, नाइट्रेड और फ्लोराइड पाया गया है. आइरन का तो असर साफ दिखता है. मुंगेर का लाल दरवाजा का क्षेत्र इससे पूरी तरीके से प्रभावित है. वहां के निवासी नरेश चंद्र राय जल के कारण इस तरह पेट की बीमारी से ग्रसित है कि दवा भी ठीक से असर नहीं कर रहा है. वहीं दूसरी ओर आर्सेनिक के कारण हाथ और तलबे चकते के साथ-साथ स्किन कैंसर के शिकार हो रहे है.
फ्लोराइड ने तो मुंगेर के खैरा का नाम चर्चित कर रखा है. कहते हैं केमिस्ट प्रयोगशाला के केमिस्ट सुनील कुमार ने कहा कि वे अकेले ही प्रयोगशाला को चला रहे हैं. यदि वे जल जांच के सिलसिले में क्षेत्र के परिभ्रमण के लिए निकलते है तो प्रयोगशाला को बंद करना पड़ता है. जिसे लेकर तरह-तरह की भ्रांतियां भी लोगों में उत्पन्न हो जाती है.
