कभी राजाओं और अंग्रेजों का ठिकाना रही तेतरिया कोठी, आज जर्जर हालत में है ऐतिहासिक इमारत

Motihari Heritage News: पूर्वी चंपारण की ऐतिहासिक तेतरिया कोठी कभी राजाओं, जमींदारों और अंग्रेज अधिकारियों का प्रमुख केंद्र रही. तीन कठिया प्रथा और चंपारण सत्याग्रह की यादों को समेटे यह धरोहर आज संरक्षण की बाट जोह रही है. स्थानीय लोगों ने इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग की है.

मोतिहारी के तेतरिया से शशि चंद्र तिवारी की रिपोर्ट

Motihari Heritage News: पूर्वी चंपारण जिले के तेतरिया प्रखंड मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक ‘तेतरिया कोठी’ आज भले ही रख-रखाव के अभाव में जर्जर अवस्था में खड़ी हो, लेकिन इसका गौरवशाली अतीत आज भी क्षेत्र के इतिहास और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की कई महत्वपूर्ण कहानियों को अपने भीतर समेटे हुए है. चंपारण सत्याग्रह और नील आंदोलन की गवाह रही यह ऐतिहासिक धरोहर वर्तमान में प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है. स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने सरकार से इस अनमोल विरासत को संरक्षित कर इसे ऐतिहासिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की पुरजोर मांग उठाई है.

Tetariya Kothi Champaran: जमींदारी व्यवस्था से नील आंदोलन तक का सफर

स्थानीय बुजुर्गों और इतिहास के जानकारों के अनुसार, तेतरिया कोठी कभी प्रसिद्ध शिवहर दरबार के अधीन आती थी. इस भव्य कोठी का निर्माण 20वीं सदी के आरंभ में अतीत मियां नामक शख्सियत द्वारा कराया गया था. बताया जाता है कि उस दौर में क्षेत्र के राजा, महाराजा एवं बड़े जमींदार जब भी इस इलाके के दौरे पर आते थे, तो इसी कोठी में ठहरकर विश्राम करते थे. यह भवन उस समय की तमाम प्रशासनिक और सामाजिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र माना जाता था. जमींदारी व्यवस्था के दौर के बाद जब देश में अंग्रेजी शासन का प्रभाव बढ़ा, तब ब्रिटिश हुकूमत ने इस कोठी पर कब्जा कर लिया और इसका उपयोग जबरन नील की खेती (Indigo Cultivation) के संचालन और उसके वित्तीय प्रबंधन के लिए किया जाने लगा.

नील की खेती और अंग्रेजी शासन से जुड़ा इतिहास

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जमींदारी व्यवस्था के बाद अंग्रेजी शासन के दौरान इस कोठी का उपयोग नील की खेती के संचालन और प्रबंधन के लिए किया जाने लगा. अंग्रेज अधिकारी यहीं से आसपास के क्षेत्रों में नील उत्पादन की गतिविधियों की निगरानी करते थे. इसी कारण तेतरिया कोठी चंपारण के नील आंदोलन और किसानों के शोषण की ऐतिहासिक घटनाओं से भी जुड़ गई.

इतिहास का काला अध्याय

तेतरिया कोठी अंग्रेजों के अधीन आने के बाद क्षेत्र में कुख्यात ‘तीनकठिया प्रथा’ (भूमि के 3/20 भाग पर नील की खेती की अनिवार्यता) को सख्ती से लागू किया गया था. इसके तहत ब्रिटिश सिपहसालारों द्वारा स्थानीय गरीब किसानों का व्यापक दमन और आर्थिक शोषण किया गया. किसानों को अपनी ही उपजाऊ जमीन पर अनाज उगाने से रोका जाता था.

चंपारण सत्याग्रह की यादें आज भी ताजा

स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि तेतरिया गांव और यह कोठी महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह की पृष्ठभूमि से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ी रही है. किसानों पर जबरन थोपी गई तीन कठिया प्रथा और नील की खेती के खिलाफ शुरू हुआ गांधीजी का आंदोलन देश के स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण अध्याय बना.

पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की जिला प्रशासन से मांग

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि तेतरिया गांव तथा यह ऐतिहासिक कोठी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह (Champaran Satyagraha) की पृष्ठभूमि से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से गहराई से जुड़ी रही है. चंपारण की इसी धरती से किसानों पर हो रहे बर्बर अत्याचारों के खिलाफ शुरू हुए गांधीजी के अहिंसक आंदोलन ने देश के पूरे स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी थी, जिसके बाद अंततः तीनकठिया प्रथा का खात्मा हुआ था.

वर्तमान में यह कोठी पूरी तरह खंडहर में तब्दील होने के कगार पर है और इसकी मरम्मत के लिए प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है. ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और पुरातत्व विभाग से मांग की है कि इस ऐतिहासिक विरासत की उचित घेराबंदी और मरम्मत कराई जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां चंपारण के इस अनमोल और गौरवशाली इतिहास से रूबरू हो सकें.

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Published by: Purushottam Kumar

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