Motihari News: पूर्वी चंपारण जिले में जीविका दीदियां अब केवल स्वयं सहायता समूहों तक सीमित नहीं हैं. वे नर्सरी संचालन के जरिए पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं. जिला जीविका परियोजना ग्रामीण के तहत संचालित "जल-जीवन-हरियाली" और "हरित जीविका, हरित बिहार" अभियान से जुड़ी महिलाएं हर साल लाखों पौधे तैयार कर अच्छी आमदनी अर्जित कर रही हैं. यह पहल महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का प्रभावी माध्यम बन गई है.
जिले में संचालित हैं 48 दीदी की नर्सरियां
पूर्वी चंपारण में वर्तमान में 48 जीविका नर्सरियां संचालित हैं. इनमें 33 नर्सरियां मनरेगा और 13 नर्सरियां वन विभाग के सहयोग से स्थापित की गई हैं. इन पौधशालाओं में फिलहाल 4.47 लाख से अधिक पौधे तैयार हैं, जिनकी अनुमानित कीमत करीब 1.34 करोड़ रुपये आंकी गई है.
सालाना 2 लाख रुपये तक हो रही कमाई
नर्सरी संचालन से जुड़ी प्रत्येक जीविका दीदी सभी खर्च निकालने के बाद सालाना 1.5 से 2 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमा रही हैं. इससे महिलाएं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ बच्चों की शिक्षा और बेहतर जीवन पर भी खर्च कर रही हैं. वन विभाग और कृषि वैज्ञानिकों की ओर से उन्हें उन्नत किस्म के फलदार, छायादार और औषधीय पौधे तैयार करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है.
सरकार सीधे खरीद रही पौधे
दीदियों को पौधों की बिक्री की चिंता नहीं करनी पड़ती. जिला प्रशासन, वन विभाग और मनरेगा विभाग सीधे नर्सरियों से पौधों की खरीद करते हैं. इन पौधों का उपयोग सार्वजनिक सड़कों, नहरों और सरकारी भूमि पर वृक्षारोपण के लिए किया जाता है. नर्सरियों में सागवान, महोगनी, आम, लीची, अमरूद समेत कई फलदार, इमारती और सजावटी पौधे तैयार किए जा रहे हैं.
सफलता की मिसाल बनीं जीविका दीदियां
चकिया प्रखंड के बलुआ गांव की एक जीविका दीदी वन विभाग के सहयोग से 60 हजार से अधिक पौधे तैयार कर सालाना करीब दो लाख रुपये की बचत कर रही हैं. वहीं बनकटवा प्रखंड के गोलापकड़िया गांव की प्रतिभा देवी ने "चांद जीविका स्वयं सहायता समूह" के माध्यम से नर्सरी शुरू की और महज छह महीने में दो लाख रुपये की कमाई कर अपने परिवार को मजदूरी से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाया. जिला प्रबंधक सौरभ कुमार ने बताया कि दीदी की नर्सरियों में हर प्रकार के पौधे उपलब्ध हैं और यह मॉडल पूरे जिले में प्रेरणा बन रहा है.
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