गांधी की कर्मभूमि तुरकौलिया आज भी बदहाल, चंपारण सत्याग्रह की यादों को संजोए बैठी है यह धरती

चंपारण सत्याग्रह से जुड़ी तुरकौलिया की ऐतिहासिक धरती आज भी पर्यटन विकास की राह देख रही है. महात्मा गांधी यहां नील किसानों पर हो रहे अत्याचार की जानकारी लेने पहुंचे थे, लेकिन आज यहां पर्यटकों के लिए जरूरी सुविधाओं का अभाव है.

मोतिहारी के तुरकौलिया से आफताब आलम की रिपोर्ट

तुरकौलिया का इतिहास: मोतिहारी शहर से करीब नौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित तुरकौलिया अपने भीतर चंपारण सत्याग्रह से जुड़ी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक यादें समेटे हुए है. महात्मा गांधी के चंपारण आगमन और नील किसानों पर हुए अत्याचार की गवाह रही यह धरती आज भी अपने ऐतिहासिक महत्व के अनुरूप पहचान और विकास का इंतजार कर रही है. यहां आने वाले पर्यटकों के लिए न तो ठहरने की बेहतर व्यवस्था है और न ही कोई विकसित पर्यटन स्थल.

चार अगस्त 1917 को तुरकौलिया पहुंचे थे गांधी

इतिहास के अनुसार महात्मा गांधी चार अगस्त 1917 को तुरकौलिया पहुंचे थे. उस दौर में अंग्रेजी हुकूमत के तहत नील की खेती करने वाले किसानों पर अत्याचार किया जाता था. किसानों को नीम के पेड़ से बांधकर पीटे जाने की घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है. किसानों की वास्तविक स्थिति जानने और उनके साथ हो रहे शोषण को समझने के लिए गांधी यहां पहुंचे थे.

महात्मा गांधी 15 अप्रैल 1917 को मोतिहारी पहुंचे थे. राजकुमार शुक्ल के निमंत्रण पर चंपारण आए गांधी ने किसानों को तिनकठिया प्रथा से मुक्ति दिलाने के लिए आंदोलन शुरू किया. यही आंदोलन आगे चलकर भारत में उनके पहले सत्याग्रह के रूप में प्रसिद्ध हुआ. इस संघर्ष में डॉ. राजेंद्र प्रसाद और अनुग्रह नारायण सिन्हा समेत कई लोगों ने उनका साथ दिया.

शताब्दी वर्ष में कई स्थल हुए विकसित

चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष 2017 में मोतिहारी और आसपास गांधी से जुड़े कई ऐतिहासिक स्थलों को विकसित किया गया. चरखा पार्क समेत कई स्थानों को नई पहचान मिली. हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि गांधी से जुड़े इतिहास के बावजूद तुरकौलिया अब भी अपेक्षित विकास से दूर है.

पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग

स्थानीय लोगों के अनुसार तुरकौलिया में गांधी से जुड़े स्थलों का संरक्षण कर यहां स्मारक, सूचना केंद्र, पार्क और बेहतर सड़क व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए. पर्यटकों के ठहरने की व्यवस्था होने से भी यहां पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है. इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे.

नई पीढ़ी तक पहुंच सकती है सत्याग्रह की कहानी

गांधी और चंपारण सत्याग्रह पर शोध करने वाले भैरव लाल दास के अनुसार चंपारण के लोगों में आज भी गांधी के प्रति गहरा लगाव है. गांधी करीब आठ महीने चंपारण में रहे और ग्रामीण पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनसे जुड़ी कहानियां सुनाते आए हैं. ऐसे में गांधी की कर्मभूमि से जुड़े तुरकौलिया को केवल इतिहास की किताबों तक सीमित रखने के बजाय संरक्षित कर नई पीढ़ी और पर्यटकों के सामने लाने की जरूरत है.

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By Prabhat khabar news desk

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