ग्रामीण स्कूलों में बदलेगा क्लासरूम का माहौल, 'नो एज-गैप मॉडल' से ड्रॉपआउट रोकने की अनूठी पहल

बिहार के सरकारी स्कूलों में दाखिले का तरीका बदल रहा है. 'नो एज-गैप मॉडल' के तहत अब छात्रों की उम्र के हिसाब से कक्षाएं तय होंगी, जिससे कमजोर और बड़े छात्रों को अगली कक्षा में सीधे प्रवेश मिलेगा.

मोतिहारी से सचिदानंद सत्यार्थी की रिपोर्ट

 Bihar NoAgeGap Model: बिहार के सरकारी स्कूलों में दाखिले की प्रक्रिया अब छात्रों की काबिलियत या अभिभावकों की इच्छा के बजाय विशुद्ध रूप से उनकी उम्र के हिसाब से तय होगी. शिक्षा विभाग इस प्रक्रिया को पारदर्शी, वैज्ञानिक और व्यावहारिक बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है. विभाग की ओर से इसके लिए "नो एज-गैप मॉडल" लागू करने की पूरी तैयारी कर ली गई है. विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, आगामी नए शैक्षणिक सत्र से इस नियम को जमीनी स्तर पर पूरी तरह से उतार दिया जाएगा.

कमजोर छात्रों को सीधे मिलेगा अगली कक्षा में प्रवेश, साल होने से बचेगा

इस नई नीति का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पढ़ाई में कमजोर या अधिक उम्र के छात्रों को अब एक ही क्लास में रोककर उनका साल बर्बाद नहीं किया जाएगा. नई व्यवस्था के अनुसार, यदि कोई छात्र उम्र में बड़ा है और पढ़ाई में थोड़ा कमजोर भी है, तो भी उसे उसी कक्षा में पीछे रोकने के बजाय उसकी उम्र के हिसाब से अगली कक्षा में ही नामांकित किया जाएगा. विभाग का मानना है कि इससे बच्चों का हौसला टूटने से बचेगा और पढ़ाई बीच में ही छूटने (ड्रॉपआउट) का खतरा बेहद कम हो जाएगा.

पहली कक्षा के लिए 5 वर्ष तो 12वीं के लिए 19 साल की उम्र सीमा तय

नई व्यवस्था में हर बच्चे की कक्षा उसकी उम्र के आधार पर ही निर्धारित होगी. नए नियमों के तहत पहली कक्षा में दाखिले के लिए बच्चे की न्यूनतम आयु 5 वर्ष होनी अनिवार्य कर दी गई है. इसी तरह, स्कूली शिक्षा के अंतिम पड़ाव यानी 12वीं कक्षा के लिए अधिकतम आयु सीमा 19 वर्ष तय की गयी है. अब तक कई स्कूल नामांकन का टारगेट पूरा करने के चक्कर में उम्र के नियमों को ताक पर रख देते थे. लेकिन अब न तो अभिभावक अपनी मर्जी से बच्चे की क्लास चुन पाएंगे और न ही स्कूल प्रशासन अपनी मनमानी चला सकेगा.

ग्रामीण इलाकों के क्लासरूम का बदलेगा माहौल, खत्म होगा असंतुलन

यह नया मॉडल विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों का माहौल बदलने वाला साबित होगा. ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या बेहद आम थी कि 10 से 12 साल के बड़े बच्चे भी पहली या दूसरी जैसी प्राथमिक कक्षाओं में ककहरा सीखते नजर आते थे. इस उम्र-असंतुलन के कारण बड़े बच्चों की मानसिक और सामाजिक पढ़ाई प्रभावित होती थी. "नो एज-गैप मॉडल" से क्लासरूम का यह असंतुलन पूरी तरह खत्म हो जाएगा और हर बच्चे को अपनी उम्र के साथियों के साथ एक स्वस्थ माहौल मिल सकेगा.

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लेखक के बारे में

By सुनील कुमार सिंह

सुनील कुमार सिंह प्रभात खबर मल्टीमीडिया में डिप्टी चीफ रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 20 वर्षों का समृद्ध अनुभव है। क्राइम और राजनीति से जुड़ी खबरों पर उनकी मजबूत पकड़ है। वे निष्पक्ष रिपोर्टिंग और गहन विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं, जिससे पाठकों को सटीक और भरोसेमंद जानकारी मिलती है।
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