मोतिहारी के बंजरिया से राज निखिल की रिपोर्ट
Motihari News: मोहम्मद मंजूर की झुकी हुई कमर, चेहरे की गहरी झुर्रियां और सफेद दाढ़ी सिर्फ उम्र की कहानी नहीं कहतीं, बल्कि उस दर्द और संघर्ष को भी बयां करती हैं, जिसे उन्होंने अपनों के बीच रहकर अकेले झेला है.
72 साल की उम्र में, जब इंसान को सहारे और आराम की जरूरत होती है, तब मोतिहारी के बंजरिया प्रखंड के गोबरी गांव निवासी मोहम्मद मंजूर रोज पेट पालने के लिए ठेला खींचते हैं.
तीन बेटे, फिर भी बेसहारा
मंजूर बताते हैं कि उनके तीन बेटे हैं. सभी शादीशुदा हैं और अपने परिवार के साथ बाहर रहते हैं. लेकिन इस बुजुर्ग पिता की सुध लेने वाला कोई नहीं.
बात करते-करते उनका गला भर आता है. वे कहते हैं कि अब जिंदगी जैसे खुद के भरोसे ही चल रही है.
उनकी एक बेटी भी है, जिसकी शादी हो चुकी है.
कमर और कोहनी के सहारे खींचते हैं ठेला
हर रोज मोहम्मद मंजूर गोबरी गांव से करीब 20 से 22 किलोमीटर दूर शहर के छतौनी सब्जी मंडी तक पैदल जाते हैं.
इस उम्र में भी वे सिर्फ हाथों से नहीं, बल्कि कमर और कोहनी का सहारा लेकर ठेला खींचते हैं. मंडी से सब्जियां और सामान खरीदकर फिर गांव लौटते हैं और आसपास के इलाकों में फेरी लगाकर बेचते हैं.
पांच साल से जारी है संघर्ष
पिछले पांच वर्षों से उनकी जिंदगी इसी संघर्ष के सहारे चल रही है.
तेज धूप, धूल भरे रास्ते और थकान के बावजूद उन्होंने मेहनत का रास्ता नहीं छोड़ा. वे कहते हैं कि “जब तक शरीर में जान है, मेहनत करते रहेंगे.”
झुर्रियों में छिपी जिंदगी की पूरी कहानी
मंजूर का चेहरा उस दर्द की तस्वीर है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं.
सिर पर गमछा बांधे, ठेले को धक्का देते यह बुजुर्ग आज उन लोगों के लिए मिसाल बन गए हैं, जो छोटी परेशानियों में हिम्मत हार जाते हैं.
उनकी कहानी सिर्फ मजबूरी की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और जिंदा हौसले की भी कहानी है.
