Madhubani News: झंझारपुर में ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, पटना एवं कृषि विज्ञान केंद्र, सुखेत के संयुक्त तत्वावधान में मंगलवार को एक दिवसीय क्षमता विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया. अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (कुक्कुट) के तहत अनुसूचित जाति उपयोजना अंतर्गत आयोजित प्रशिक्षण में सैनी गांव के 50 अनुसूचित जाति किसान एवं महिलाओं ने भाग लिया.
वैज्ञानिकों ने बताए आधुनिक मुर्गी पालन के तरीके
प्रशिक्षण के दौरान बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. पुष्पेंद्र सिंह ने बताया कि बैकयार्ड मुर्गी पालन की सफलता काफी हद तक सही नस्ल के चयन पर निर्भर करती है. उन्होंने कहा कि स्थानीय देसी मुर्गियों की तुलना में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा विकसित 'वनराजा' और 'ग्रामप्रिया' नस्लें अधिक उपयुक्त हैं. ये विपरीत परिस्थितियों को सहन करने के साथ सालाना 160 से 180 अंडे देने की क्षमता रखती हैं.
डॉ. रोहित कुमार जायसवाल ने कहा कि चूजों के जन्म के बाद शुरुआती 4 से 5 सप्ताह सबसे महत्वपूर्ण होते हैं. इस दौरान कृत्रिम गर्मी, संतुलित आहार और समय पर टीकाकरण से मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया जा सकता है. उन्होंने रानीखेत और चेचक जैसी बीमारियों से बचाव के लिए समय पर टीका लगाने की सलाह दी.
सुरक्षित शेल्टर और बेहतर प्रबंधन पर दिया गया जोर
कृषि विज्ञान केंद्र, सुखेत के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. जगपाल ने किसानों को बताया कि दिन में मुर्गियों को खुले में छोड़ा जा सकता है, लेकिन रात में सुरक्षित और हवादार शेल्टर में रखना जरूरी है. उन्होंने बांस, लकड़ी और फूस से कम लागत वाला सुरक्षित शेल्टर बनाने की जानकारी दी.
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक राहुल सिंह राजपूत ने कहा कि यह कार्यक्रम अनुसूचित जाति परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है. देसी और उन्नत नस्ल की मुर्गियों के अंडे एवं मांस की बाजार में अच्छी मांग है, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है.
