मधुबनी: श्रावण मास के आगमन के साथ ही मिथिला का जनजीवन मधुश्रावणी पर्व की रंगत में रंग गया है. गांव-गांव और घर-आंगन में मधुश्रावणी के पारंपरिक लोकगीत गूंज रहे हैं. नवविवाहिताएं पूरे विधि-विधान से यह पर्व मना रही हैं और पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन तथा परिवार की खुशहाली की कामना कर रही हैं. महिलाओं के सामूहिक लोकगायन से पूरे मिथिला क्षेत्र का माहौल भक्तिमय और उत्सवी बन गया है.
लोकगीतों से जीवंत हुई मिथिला की संस्कृति
सुबह और शाम महिलाएं एवं युवतियां एकत्र होकर देवी-देवताओं की आराधना के साथ पारंपरिक मधुश्रावणी गीत गा रही हैं. गीतों में माता गौरी, भगवान शिव, विषहरी माता और नाग देवता की महिमा के साथ वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि की मंगलकामना झलकती है. गांव की गलियां इन मधुर लोकधुनों से गुलजार हैं और हर ओर उत्सव जैसा माहौल दिखाई दे रहा है.
नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ रहा है पर्व
मधुश्रावणी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मिथिला की समृद्ध लोकसंस्कृति और पारिवारिक परंपराओं का जीवंत प्रतीक भी है. लोकगीतों के माध्यम से महिलाएं पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं. यही कारण है कि यह पर्व आज भी मिथिला की पहचान बना हुआ है.
सैकड़ों वर्षों से निभाई जा रही परंपरा
मधुश्रावणी व्रत की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है. इस दौरान नवविवाहिताएं मिट्टी से बने नाग-नागिन, हाथी, माता गौरी और भगवान शिव की प्रतिमाएं बनाकर उनकी पूजा करती हैं. फल, फूल और मिठाइयों का भोग लगाया जाता है. आठवें और नौवें दिन खीर और रसगुल्ले का विशेष प्रसाद चढ़ाने की परंपरा भी निभाई जाती है. सुबह फूल चुनने और शाम को फूलों से पूजा की डाली सजाने की विशेष रस्म होती है.
नवविवाहिताओं के लिए खास है मधुश्रावणी
मधुश्रावणी पर्व नवविवाहिताओं के लिए विशेष महत्व रखता है. वे इस व्रत को पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य, गृहस्थ जीवन में सुख-शांति और सम्मान की कामना के साथ करती हैं. इस पर्व में गौरी-शंकर के साथ विषहरी माता और नाग-नागिन की पूजा का भी विशेष महत्व है. मान्यता है कि नाग देवता की आराधना से परिवार में सुख-समृद्धि और मंगल बना रहता है.
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