मधुबनी से अनिल कुमार झा की रिपोर्ट
Madhubani News: बिहार सरकार के दावों के विपरीत मधुबनी का ‘मॉडल’ सदर अस्पताल खुद बीमार चल रहा है . जिला अस्पताल को सुपर स्पेशियलिटी का दर्जा तो मिल गया है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं और डॉक्टरों की भारी कमी के कारण 55 लाख से अधिक की आबादी निजी अस्पतालों के भरोसे है . स्थिति यह है कि अस्पताल में पिछले 7 वर्षों से अधीक्षक और 5 वर्षों से उपाधीक्षक का स्थायी पद खाली पड़ा है. वर्तमान में प्रभारी उपाधीक्षक के सहारे प्रशासनिक और चिकित्सकीय कार्यों का किसी तरह संपादन किया जा रहा है. एक्टिंग उपाधीक्षक के पास वित्तीय और प्रशासनिक फैसले लेने के अधिकार सीमित हैं, जिससे अस्पताल के विकासात्मक कार्य अटके हुए है.
स्वीकृत पदों के मुकाबले डॉक्टरों की भारी कमी
अस्पताल में डॉक्टरों की भारी किल्लत है. कुल 74 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 46 चिकित्सक ही पदस्थापित है. हद तो यह है कि सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल होने के बावजूद यहाँ कोई कार्डियक (हृदय रोग) और चर्म रोग विशेषज्ञ नहीं है. स्वीकृत पदों की सूची में कार्डियक चिकित्सक का पद ही शामिल नहीं है . साल 2025 में आनन-फानन में आईसीयू सेवा तो शुरू कर दी गई, लेकिन विशेषज्ञों के बिना गंभीर मरीजों को आज भी रेफर या निजी क्लीनिकों का रुख करना पड़ता है.
अल्ट्रासाउंड के लिए 20 दिन का इंतजार, निजी केंद्रों की चांदी
अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट और एनेस्थेटिक जैसे महत्वपूर्ण विशेषज्ञों की भी कमी है. आधुनिक अल्ट्रासाउंड मशीन होने के बावजूद रेडियोलॉजिस्ट न होने से मरीजों को 15 से 20 दिनों का समय दिया जा रहा है. वैकल्पिक व्यवस्था के तहत तैनात डॉक्टर रोजाना केवल 15-20 जांच ही कर पाते हैं, जबकि ओपीडी में रोज 500 से 600 मरीज आते हैं. मजबूरन मरीजों को बाहर के निजी सेंटरों में जाकर आर्थिक शोषण का शिकार होना पड़ रहा है.
