Madhubani News: जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों बंदरों का आतंक चरम पर पहुंच गया है, जिससे स्थानीय ग्रामीणों और किसानों की परेशानी बेहद बढ़ गई है. जिले के नरुआर, राजेग्राम, सरिसब पाही और लोहना सहित विभिन्न गांवों में इस समय हजारों की संख्या में बंदरों ने डेरा डाल रखा है. झुंड बनाकर घूम रहे इन बंदरों के कारण न तो लोग अपने घरों से बाहर सुरक्षित निकल पा रहे हैं और न ही किसान अपने खेतों और बगीचों में शांति से काम कर पा रहे हैं. बंदरों की बढ़ती आबादी और उनके हिंसक व्यवहार से पूरे इलाके में खौफ का माहौल बना हुआ है.
पटाखा फोड़ने पर भी नहीं भागते बंदर
इस साल बंदरों के कारण मिथिलांचल की प्रसिद्ध आम की फसल सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है. बगीचों में पेड़ों पर लदे आमों को बंदर बुरी तरह नष्ट कर रहे हैं. स्थानीय आम कारोबारी कामू राय ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि एक साथ दर्जनों बंदर आम के पेड़ों पर चढ़ जाते हैं और टहनियों को इस तरह हिलाते-झुलाते हैं कि कच्चे और पक्के आम टूटकर नीचे गिर जाते हैं. उन्होंने बताया कि वे और उनके मजदूर दिन भर सिर्फ बंदरों के झुंड को बगीचे से खदेड़ने में ही लगे रहते हैं, जिससे उनका दूसरा काम पूरी तरह ठप हो गया है. कारोबारी ने चिंता जताते हुए कहा कि पहले बंदर पटाखे की आवाज सुनकर डर के मारे भाग जाते थे, लेकिन अब वे इसके भी आदी हो चुके हैं और आवाज होने पर भी पेड़ से टस से मस नहीं होते.
घर के बाहर सामान रखना हुआ मुहाल
बंदरों का यह आतंक सिर्फ फसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे अब इंसानों पर भी सीधे जानलेवा हमले कर रहे हैं. नरुआर लोहान के रहने वाले भैरव झा ने बताया कि कुछ दिन पूर्व वे अपने घर के दरवाजे पर बैठकर सुबह का नाश्ता कर रहे थे. इसी बीच पेड़ पर बैठा एक बंदर अचानक नीचे उतरा और उन पर हमला करके बुरी तरह काट लिया, जिसके बाद उन्हें अस्पताल जाकर एंटी-रेबीज का इंजेक्शन (सुई) लगवाना पड़ा. इलाके में ऐसे कई लोग हैं जिन्हें बंदर अब तक अपना शिकार बना चुके हैं.
इस संबंध में नरुआर के पूर्व मुखिया सुजीत मिश्रा ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि बंदरों के डर से अब घरों के बाहर या आंगन में कोई भी सामान रखना नामुमकिन हो गया है. वहीं स्थानीय ग्रामीण गिरीश चंद्र झा ने कहा कि अगर कोई भी खाने-पीने की वस्तु या घरेलू सामान बाहर छूट जाता है, तो बंदरों का पूरा झुंड झपट्टा मारकर उसे उठा ले जाता है और विरोध करने पर काटने दौड़ता है.
जिला प्रशासन और वन विभाग से लगाई गुहार
बंदरों की इस विकराल समस्या से निपटने के लिए ग्रामीणों ने अपने स्तर पर भी कई प्रयास किए, लेकिन सब विफल रहे. स्थानीय ग्रामीण उदय चंद्र पाठक, सोहन झा, अनिल कामत, नागेश कुमार और भरत मंडल सहित कई लोगों ने सामूहिक रूप से बताया कि बंदरों को पकड़ने वाले संवेदकों (शिकारियों) को बुलाने के लिए उन लोगों ने कई बार आपस में चंदा इकट्ठा किया और भारी राशि देकर बंदरों को पकड़वाया. हालांकि, कुछ ही दिनों के बाद पहले से भी बड़ी संख्या में बंदरों के नए झुंड वापस गांवों में आ धमकते हैं.
ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने इस संकट से निजात पाने के लिए वन विभाग को भी लिखित और मौखिक रूप से कई बार सूचित किया, लेकिन विभागीय अधिकारियों की उदासीनता के कारण अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. थक-हारकर अब पीड़ित ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और जिलाधिकारी से इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान निकालने और बंदरों को सुरक्षित वन क्षेत्रों में भिजवाने के लिए पुरजोर आग्रह किया है.
मधुबनी से केके पुट्टी की रिपोर्ट
