फरक्का जल संधि पर जदयू का नीतीश संवाद, सुधांशु शेखर बोले- बिहार के हित में नहीं है संधि

जदयू ने फरक्का जल संधि के खिलाफ जन-जागरूकता अभियान चलाया है. पार्टी का दावा है कि यह संधि बिहार के जल प्रबंधन, किसानों, पेयजल और बाढ़-सूखे जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बन रही है. यह अभियान बक्सर से शुरू होकर कटिहार में समाप्त होगा, जिसका उद्देश्य बिहार के हितों की आवाज केंद्र तक पहुंचाना है.

मधुबनी: फरक्का जल संधि पर जन-जागरुकता के लिए आयोजित कार्यक्रम में जदयू द्वारा चलाये जा रहे फरक्का जल संधि पर नीतीश संवाद कार्यक्रम और इसके उद्देश्यों की विस्तार से जानकारी दी गयी. वक्ताओं ने कहा कि जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा एवं प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा इस कार्यक्रम के तहत गंगा किनारे बसे बिहार के 12 जिलों में संवाद कर रहे हैं. पार्टी के अनुसार, ये जिले बक्सर, भोजपुर, सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, लखीसराय, मुंगेर, खगड़िया, भागलपुर और कटिहार हैं और फरक्का जल संधि से सबसे अधिक प्रभावित हैं.

बक्सर से शुरू हुआ अभियान, कटिहार में होगा समापन

विधायक सुधांशु शेखर ने कहा कि पार्टी के इस जन-जागरुकता अभियान का शुभारंभ 5 सितंबर को बक्सर से हुआ. इसका समापन कटिहार में होगा. उन्होंने कहा कि बिहार में गंगा बक्सर से प्रवेश करती है और कटिहार से निकलती है.

उन्होंने कहा कि जदयू का स्पष्ट कहना है कि वर्ष 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई फरक्का जल संधि भारत के, खासकर बिहार के हित में नहीं है. हाल में संसद के मानसून सत्र के दौरान राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने राज्यसभा में इस विषय को उठाया और कहा कि इसका नवीनीकरण नहीं होना चाहिए. अगर कोई संधि होती भी है तो बिहार की वर्ष 2050 तक की जल आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए.

जल प्रबंधन बिगड़ने का लगाया आरोप

जिलाध्यक्ष फूले भंडारी ने कहा कि इस जल संधि के कारण बिहार का जल-प्रबंधन बुरी तरह बिगड़ा है और राज्य गंभीर जल-संकट का सामना कर रहा है. उन्होंने कहा कि जब बक्सर के पास गंगा का प्रवाह महज 400 क्यूमेक से 1400 क्यूसेक तक रह जाता है, तब भी फरक्का से बांग्लादेश के लिए 1500 क्यूमेक, लगभग 53 हजार क्यूसेक पानी छोड़ना पड़ता है.

उन्होंने दावा किया कि इसका मतलब है कि सिर्फ गंगा ही नहीं, बल्कि बिहार की आंतरिक नदियों से भी पानी खींचकर बांग्लादेश को दिया जा रहा है. जदयू का कहना है कि यह सीधे तौर पर बिहार की हकमारी है.

किसानों और पेयजल पर असर का दावा

जदयू नेताओं ने कहा कि बिहार और केंद्र की तत्कालीन सरकार में बैठे लोगों ने बिहार के हितों की बलि चढ़ा दी. उनके अनुसार, ऐसा करते समय यह नहीं सोचा गया कि इससे बिहार के किसानों की सिंचाई, लोगों का पेयजल, उद्योगों की पानी की जरूरत, लाखों लोगों की आजीविका और राज्य के युवाओं का भविष्य प्रभावित हो सकता है.

जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शुरू से कहते रहे हैं कि फरक्का बराज और फरक्का जल संधि से बिहार को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है.

बाढ़ और सूखे को लेकर भी उठाये सवाल

जन-जागरुकता अभियान के तहत जदयू की ओर से कहा गया कि एक ओर फरक्का बराज के कारण गंगा में भारी गाद जमा होने से नदी का तल ऊंचा हो गया है, जिसके कारण उत्तर बिहार को हर साल बाढ़ का सामना करना पड़ता है. वहीं दूसरी ओर फरक्का जल संधि के कारण शुष्क मौसम में बिहार के हिस्से का पानी बांग्लादेश को देना पड़ता है और बिहार के कई जिलों में सूखे तक की स्थिति हो जाती है.

पार्टी ने दावा किया कि इस अंतर्राष्ट्रीय संधि का 73 प्रतिशत बोझ अकेले बिहार उठा रहा है और यह बिहार के साथ ज्यादती है. नेताओं ने कहा कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के प्रयासों से आज यह मुद्दा राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन चुका है.

जनसरोकार का मुद्दा बताया

नेताओं ने कहा कि फरक्का जल संधि पर नीतीश संवाद अभियान को व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है. जदयू के अनुसार, यह पहल किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि पार्टी का जनसरोकार है.

नेताओं ने कहा कि फरक्का गंगा जल संधि के कारण बिहार को कैसे और कितना नुकसान हो रहा है, इसे लेकर बिहार की आवाज केंद्र तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि गंगा से जुड़े सवाल देश के सामने आएं और फरक्का जल संधि पर पुनर्विचार हो.

कार्यक्रम में फूलदेव यादव, सन्नी सिंह, गुलाब साह, अविनाश सिंह गॉड सहित कई कार्यकर्ता मौजूद थे.

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लेखक के बारे में

By नागेंद्र नाथ झा

पिछले 20 वर्षों से प्रिंट पत्रकारिता में सक्रिय हैं. देश के कई प्रतिष्ठित नेशनल न्यूज चैनलों में काम करने के कारण राजनीतिक घटनाक्रमों और राजनीतिक दलों की खबरों के विशेषज्ञ माने जाते हैं. राजनीतिक विश्लेषण और पैनी रिपोर्टिंग में इन्हें महारथ हासिल है.

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