मधुबनी की धरती से निकलेगा मिथिला का 2000 साल पुराना इतिहास, अब यहां पर होगी खुदाई

Bihar News: मधुबनी के ऐतिहासिक स्थल बलिराजगढ़ में वैज्ञानिक उत्खनन को हरी झंडी मिल गई है. ASI की मंजूरी के बाद मिथिला की प्राचीन सभ्यता से जुड़े नए रहस्य सामने आने की उम्मीद है. जिससे इस धरोहर को पर्यटन के ग्लोबल मैप पर लाने की राह भी खुलेगी.

Bihar News: बिहार के मधुबनी जिले में स्थित ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल बलिराजगढ़ पर वैज्ञानिक उत्खनन के लिए आधिकारिक स्वीकृति मिल गई है. ‘राजा बली का गढ़’ के नाम से प्रसिद्ध इस स्थल पर अब व्यवस्थित खुदाई होगी. इससे मिथिला की प्राचीन सभ्यता और इतिहास पर नए सिरे से प्रकाश पड़ने की उम्मीद है.

ASI ने दी उत्खनन की मंजूरी

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने बलिराजगढ़ में उत्खनन की अनुमति प्रदान की है. जानकारी के अनुसार, इस विषय पर जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा ने केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और ASI के महानिदेशक से लगातार बातचीत की. उनके प्रयासों के बाद यह स्वीकृति संभव हो सकी.

संजय कुमार झा परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष भी हैं. उन्होंने बलिराजगढ़ को एक अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने में विशेष रुचि दिखाई है.

डॉ. हरि ओम शरण के निर्देशन में होगा कार्य

उत्खनन कार्य ASI के पटना सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. हरि ओम शरण के निर्देशन में कराया जाएगा. स्वीकृत साइट प्लान में चिन्हित क्षेत्र को लाल रंग से दर्शाया गया है. सभी नियमों और दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना अनिवार्य होगा.

उत्खनन के दौरान प्राप्त प्राचीन वस्तुओं की विस्तृत सूची संबंधित कार्यालय को सौंपी जाएगी. क्षेत्रीय कार्य पूरा होने के तीन महीने के भीतर विस्तृत रिपोर्ट महानिदेशक को प्रस्तुत करनी होगी.

1 वर्ग किलोमीटर में फैला ऐतिहासिक किला

मधुबनी जिले के बाबूबरही प्रखंड में स्थित बलिराजगढ़ लगभग 1 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है. इसे मिथिला के राजा बलि की राजधानी माना जाता है. लोकमान्यताओं के अनुसार यह असुर राजा बलि का गढ़ था, जो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध थे. ASI ने इस स्थल को वर्ष 1938 में संरक्षित स्मारक घोषित किया था.

शुंग से पाल काल तक के मिले प्रमाण

1962 से 2014 के बीच हुई खुदाई में शुंग-कुषाण काल (लगभग 200 ईसा पूर्व) से लेकर पाल काल तक के अवशेष मिले हैं. यहां से नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW), टेराकोटा मूर्तियां, तांबे के सिक्के, पत्थर के मनके और लोहे की वस्तुएं बरामद हुई हैं.

विशेष रूप से पकी ईंटों से बनी विशाल सुरक्षात्मक दीवार और पक्की नालियों के अवशेष मिले हैं. ये लगभग 2000 वर्ष पुराने उन्नत शहरी नियोजन के संकेत देते हैं.

पर्यटन और रोजगार की नई संभावना

बलिराजगढ़ को एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना है. इससे न सिर्फ मिथिला की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा.

यह पहल बिहार की ऐतिहासिक धरोहर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है. मिथिला की प्राचीन सभ्यता अब नए साक्ष्यों के साथ दुनिया के सामने आ सकती है.

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Published by: Abhinandan Pandey

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