मधुश्रावणी पर्व पर लोकगीतों से गूंजा मिथिला, 13 दिन तक नाग-गौरी की पूजा करती हैं नवविवाहिताएं

मिथिला में मधुश्रावणी पर्व भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है, जहां पारंपरिक लोकगीत नवविवाहिताओं के कंठ से गूंज रहे हैं. यह पर्व दांपत्य जीवन की मंगलकामना, प्रकृति के प्रति आस्था और मिथिला की समृद्ध लोकसंस्कृति का सुंदर संगम है.

Madhubani News: मधुश्रावणी पर्व के अवसर पर मिथिला के गांवों में इन दिनों पारंपरिक लोकगीतों की मधुर स्वर-लहरियां गूंज रही हैं. नवविवाहिताओं के कंठ से निकलने वाले श्रद्धा, प्रेम और लोक संस्कार से जुड़े गीत घर-आंगन के साथ गांव की गलियों को भी भक्तिमय बना रहे हैं. इस पर्व में दांपत्य जीवन की मंगलकामना, प्रकृति के प्रति आस्था और मिथिला की समृद्ध लोकसंस्कृति का सुंदर संगम देखने को मिलता है.

लोकगीतों से गूंज रहा है मिथिला का घर-आंगन

मधुश्रावणी के दौरान नवविवाहिताएं पारंपरिक गीत गाते हुए पूजा की तैयारी करती हैं. इन गीतों में पति के प्रति प्रेम, दांपत्य जीवन की मंगलकामना और देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति होती है. पीढ़ियों से चली आ रही यह गीत परंपरा आज भी मिथिला के ग्रामीण समाज में जीवंत है और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ रही है.

पति की दीर्घायु के लिए नवविवाहिता रखती हैं व्रत

मिथिला में नवविवाहिता अपने पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिए मधुश्रावणी व्रत रखती हैं. शादी के बाद पड़ने वाले पहले श्रावण कृष्ण पक्ष की पंचमी से शुक्ल पक्ष की तृतीया तक चलने वाले इस पर्व में करीब 13 दिनों तक पूजा-अर्चना और कथा श्रवण की परंपरा है.

इस दौरान नवविवाहिताएं नाग देवता, मां गौरी, गणेश और भगवान शिव की पूजा करती हैं. वे सज-संवरकर अपनी सहेलियों के साथ फूल चुनने बगिया में जाती हैं और पूजा के लिए फूलों को विशेष रूप से तैयार करती हैं.

बासी फूलों से होती है मां गौरी की पूजा

मधुश्रावणी की खास परंपराओं में बासी फूलों से मां गौरी की पूजा प्रमुख है. नवविवाहिता प्रतिदिन बगिया से फूल चुनकर डाली में सजाती हैं. अगले दिन इन्हीं फूलों से मां गौरी की आराधना की जाती है.

पूजा के दौरान प्राचीन कथाओं का श्रवण भी किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं में नाग देवता और मां गौरी की पूजा को सुहाग एवं दांपत्य जीवन की मंगलकामना से जोड़ा गया है.

मिथिला में मधुश्रावणी का विशेष धार्मिक महत्व

मान्यता है कि माता पार्वती ने सबसे पहले मधुश्रावणी व्रत रखा था और भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया था. इस पर्व के दौरान माता पार्वती और भगवान शिव से जुड़ी मधुश्रावणी कथा सुनने की भी परंपरा है.

पूजा में बासी फूल, ससुराल से आई पूजन सामग्री, दूध, लावा और अन्य सामग्री का उपयोग किया जाता है. नाग देवता और विषहर की भी विधि-विधान से पूजा की जाती है.

सदियों पुरानी परंपरा आज भी बरकरार

मधुश्रावणी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मिथिला की लोकसंस्कृति और पारिवारिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है. 13 दिनों तक व्रत रखने वाली नवविवाहिताएं प्रतिदिन एक बार अरवा भोजन करती हैं. नाग-नागिन, हाथी, गौरी और शिव की प्रतिमाएं बनाकर फूल, फल और मिठाइयों से पूजा की जाती है.

सुबह और शाम नाग देवता को दूध और लावा का भोग लगाया जाता है. लोकगीत, पूजा-विधि और सामूहिक सहभागिता के कारण मधुश्रावणी पर्व आज भी मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत कर रहा है.

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By Awadesh kumar das

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