Madhubani News: जिले की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को अक्षुण्ण रखने तथा उसे आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है. जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी नीतीश कुमार की अध्यक्षता में मिथिला ललित संग्रहालय में ‘पुरातत्व संग्रहालय गतिविधियों’ के संचालन के संबंध में गठित विशेष कमेटी की एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई. इस बैठक में प्रबुद्ध इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों ने शिरकत की और संग्रहालय के विकास को लेकर कई दूरगामी सुझाव दिए.
बैठक के एजेंडे पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी नीतीश कुमार ने बताया कि जिलाधिकारी महोदय के कुशल नेतृत्व में जिले के गाँव-गाँव में बिखरी पड़ी सांस्कृतिक और पुरातात्विक धरोहरों को सहेजने के लिए मिथिला ललित संग्रहालय के तत्वावधान में एक व्यापक जन-मुहिम चलाई जाएगी.
दीवारों पर उकेरी जाएंगी प्राचीन लिपियां
बैठक के दौरान प्रो. नरेंद्र नारायण सिंह निराला ने एक अनुकरणीय मिसाल पेश करते हुए अपने निजी संग्रह में मौजूद दुर्लभ पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं को संग्रहालय में दान देने की इच्छा जताई. इसके साथ ही उन्होंने समस्त जिलेवासियों से भी अपील की कि वे अपने घरों में सुरक्षित ऐतिहासिक धरोहरों को स्वेच्छा से संग्रहालय को सौंपें, ताकि आने वाली पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास से रूबरू हो सके.
वहीं, प्रो. उदय नारायण तिवारी ने संग्रहालय को ज्ञान का केंद्र बनाने का अनूठा सुझाव दिया. उन्होंने कहा कि संग्रहालय की दीवारों पर प्राचीन भारतीय और स्थानीय मिथिलाक्षरा व अन्य लिपियों को खूबसूरती से प्रदर्शित किया जाना चाहिए, ताकि यहाँ आने वाले आगंतुक और छात्र इन लुप्तप्राय लिपियों की बुनियादी जानकारी आसानी से हासिल कर सकें.
अनुमंडल स्तर पर होंगी कार्यशालाएं
पुरातत्व अवशेषों पर लंबा शोध कर चुके डॉ. सुशांत कुमार ने धरोहरों के तात्कालिक संरक्षण पर जोर दिया. उन्होंने सुझाव दिया कि जिले के सभी अनुमंडल स्तरों पर पुलिस-प्रशासन, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को शामिल कर विशेष कार्यशालाएं (वर्कशॉप) आयोजित की जाएं. इससे जमीनी स्तर पर जागरूकता फैलेगी और कहीं भी खुदाई या तालाब सौंदर्यीकरण के दौरान मिलने वाली प्राचीन मूर्तियों को नष्ट होने से बचाया जा सकेगा.
जो मूर्तियां नहीं आ सकतीं उनकी बनेगी रिप्लिका
पुरातत्व क्षेत्र के शोधार्थी मुरारी कुमार झा ने एक व्यावहारिक नीति का प्रस्ताव रखा. उन्होंने कहा कि मधुबनी के गांवों में बड़ी संख्या में ऐतिहासिक मूर्तियां खुले आसमान के नीचे या स्थानीय डीह पर मौजूद हैं. उन्हें सुरक्षित संग्रहालय तक लाने की मुहिम शुरू हो. इसके अलावा, जिन मूर्तियों को आस्था या स्थानीय कारणों से संग्रहालय लाना संभव नहीं है, उनकी हूबहू ‘रिप्लिका’ (प्रतिमूर्ति) तैयार करवाकर संग्रहालय में स्थापित की जानी चाहिए.
विकसित होगी लाइब्रेरी
संग्रहालय को शोधार्थियों के अनुकूल बनाने के लिए डॉ. शिव कुमार पासवान ने परिसर में एक समृद्ध और विकसित पुस्तकालय (लाइब्रेरी) स्थापित करने की आवश्यकता जताई, जिससे इतिहास के अध्येताओं और छात्रों को काफी मदद मिलेगी.
दाताओं का नाम सुनहरे अक्षरों में होगा दर्ज
संग्रहालय के विकास और दाताओं के सम्मान पर बात करते हुए डॉ. अभिषेक कुमार ने कहा कि जो भी नागरिक अपनी बहुमूल्य वस्तुएं दान करते हैं, उनकी पूरी जानकारी उस वस्तु के साथ बकायदा प्रदर्शित की जानी चाहिए. इससे दाताओं और उनकी भावी पीढ़ियों को गर्व की अनुभूति होगी और समाज में धरोहरों को दान करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा.
अवशेषों पर होगा विशेष काम
विशेषज्ञों के विचारों को सुनने के बाद जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी नीतीश कुमार ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि जिन जानकारियों और अनुभवों को समेकित करने में कई साल लग जाते, वे आज इस बैठक के माध्यम से एक मंच पर आ गई हैं. ये अनुभव मिथिला ललित संग्रहालय और पुरातत्व की भावी नीति तय करने में अमूल्य साबित होंगे.
उन्होंने जोर देकर कहा कि जिले में रामायण सर्किट और बौद्ध सर्किट के साथ-साथ ऐतिहासिक ऑइनवार, कर्णाट और खंडवला राजवंशों से जुड़े कई ऐतिहासिक स्थलों व अवशेषों को दुनिया के सामने लाने और उन्हें संरक्षित करने की सख्त जरूरत है.
मधुबनी से नागेंद्र नाथ झा की रिपोर्ट
