नदियों को संरक्षित करने की है जरूरत, नदी में भरा है कचरा

नदी में भरा है कचरा

मधेपुरा.

मधेपुरा जिला का यह सौभाग्य है कि शहर कहें या नगर वाला हिस्सा के तीनों ओर नदी बह रही है, लेकिन नदी का दुर्भाग्य यह है कि वह मधेपुरा में बह रही है. इन नदियों को बचाने वाला कोई नहीं है. यह नदी जिला प्रशासन, नगर परिषद व जनप्रतिनिधियों के लापरवाही का भेंट चढ़ गया है. नदी के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है, जिसे बचाने वाला शायद जिला में कोई नहीं है. जिले की नदियों को संरक्षित करने के लिए जल्द से जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इन नदियों की हालात सिंहेश्वर प्रखंड स्थित परवाने नदी की तरह हो जायेगी, जो पूरी तरह से सूख चुकी है और जिसे सिर्फ कहानियों में ही याद किया जाता है. आज के युवाओं को तो यह भी पता नहीं है कि सिंहेश्वर मंदिर के बगल से कभी परवाने नदी भी बहा करती थी. जिसमें अभी कचरा भरा पड़ा है, उसमें कभी पानी बहा करती थी.

– नगर परिषद के सिर पर है नदी को सुखाने की जिम्मेदारी –

नदियों को पूजने की परंपरा रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण छठ पर्व है. जब लोग नदी में खड़े होकर सूर्य देवता एवं छठ मईया की पूजा करते हैं, लेकिन जिले की नदियों की जो हालात है, उसे देखकर यह कहा जा सकता है कि कुछ सालों के बाद लोगों को नदी में खड़े होकर छठ पर्व मनाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा. जिले की नदी सूखने के कगार पर है. इसका सबसे बड़ा कारण जिला प्रशासन, नगर परिषद एवं जनप्रतिनिधियों की लापरवाही एवं अनदेखा रवैया अपनाया जाना है. नगर परिषद ने मानो नदी को सुखाने की जिम्मेदारी अपने सिर पर ले लिया है. शहर का सारा कचरा नदी किनारे ही गिराया जा रहा है.

– नाले का रूप ले चुकी है नदी –

जिले में नदियों के अस्तित्व पर सालों से संकट के बादल मंडरा रहे हैं. जिला प्रशासन एवं क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की लापरवाही के कारण जिला मुख्यालय की नदियां सूखती जा रही है. जिला मुख्यालय स्थित भिरखी पुल के नीचे से बहने वाली नदी के बीचों-बीच मिट्टी का टीला बना हुआ है. जिसके कारण नदी, नाले का रूप ले चुकी है और हर साल लोगों को छठ पूजा में परेशानी उत्पन्न होती है.

– छठ के समय लोगों को होती है परेशानी –

भिरखी पुल के नीचे बहती नदी में हर साल छठ के समय जब लोगों को परेशानी होती है तो जिला प्रशासन एवं नगर परिषद द्वारा नदी में पानी अधिक होने की बात कहकर नदी के किनारे से मिट्टी काट कर साफ कर दिया जाता है और कहा जाता है कि नदी में पानी कम होने पर मिट्टी का टीला हटा दिया जायेगा, लेकिन काम खत्म और बात खत्म. हालांकि अधिकांश लोगों को भी छठ पर्व के समय ही नदी संरक्षण की याद आती है.

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