आलमनगर (मधेपुरा). मूसलाधार बारिश और कोसी बराज से छोड़े गए पानी के कारण कोसी नदी के जलस्तर में लगातार वृद्धि हो रही है. इससे आलमनगर प्रखंड के कई पंचायतों और गांवों में बाढ़ का पानी फैल गया है. खापुर, रतवारा, गंगापुर, इटहरी पंचायत के अलावा कुंजौरी और बड़गांव में भी पानी पहुंचने से लोगों की परेशानी बढ़ गयी है. कई जगह बाढ़ प्रभावित परिवार ऊंचे स्थानों पर शरण लेने को मजबूर हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि कई दिनों से बाढ़ से घिरे रहने के बावजूद उन्हें अब तक पर्याप्त राहत सामग्री नहीं मिली है.
कई पंचायतों के दर्जनों गांव बाढ़ की चपेट में
बाढ़ का पानी रतवारा पंचायत के कपसिया, ललिया पुनर्वास, सुखार घाट, अजमेरी पुर वासा, छतौना बासा, रतवारा, रतवारा पश्चिम छतौना बासा, मूल मुरौत, भवानीपुर वासा, विस्थापित मुरौत, शिव मंदिर से पूरब, विस्थापित महादलित टोला और विस्थापित निषाद टोला सहित कई इलाकों में फैल गया है.
खापुर पंचायत के चौरली बासा, रायपुर बासा, खापुर, औराय बासा, दुकठीया और पचभीरा समेत कई गांव प्रभावित हैं. वहीं गंगापुर पंचायत के पिपरपाती टोला, पैंकात टोला, नोनिया चक टोला, कोलवारा टोला, भोरकाट टोला, मलहा बासा, बैजू मड़र बासा, कचहरी टोला, मुसहरी टोला, डॉक्टर टोला, भरसों टोला, अठगामा, कुम्हारा बासा, लूटना, मारवाड़ी बासा, हरजौरा घाट, खरुवा बासा, झंडापुर वासा, बलुआ बासा, पौड़ा टोला, मुनी टोला, श्रवन्नी वासा और नवटोलिया समेत कई गांव बाढ़ की चपेट में हैं. ग्रामीणों के अनुसार इन क्षेत्रों में करीब एक लाख से अधिक आबादी प्रभावित हुई है.
राहत नहीं मिलने का ग्रामीणों ने लगाया आरोप
ग्रामीण नीतीश कुमार, पिंटू सिंह, अवधेश मंडल, सियाराम मंडल, राकेश सिंह, मुकेश मंडल और सीताराम सहनी समेत अन्य लोगों ने बताया कि वे लगातार कई दिनों से बाढ़ के पानी से घिरे हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि अब तक सरकार की ओर से उन्हें सूखा राशन तक उपलब्ध नहीं कराया गया है.
ग्रामीणों ने कहा कि बाढ़ के कारण रोजमर्रा का काम बंद है और खेतों में पानी भरने से फसल को भी नुकसान हुआ है. ऐसे में परिवारों के सामने भोजन और अन्य जरूरी सामान की समस्या खड़ी हो गयी है. राहत नहीं मिलने से प्रभावित परिवारों में प्रशासन के प्रति नाराजगी बढ़ रही है.
पशुचारे का भी गहराया संकट
बाढ़ का पानी फैलने के बाद पशुपालकों के सामने पशुचारे की समस्या भी उत्पन्न हो गयी है. चारा उपलब्ध नहीं होने के कारण कई पशुपालक अपने मवेशियों को लेकर ऊंचे स्थानों पर शरण लिए हुए हैं.
कोसी नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ पानी नए इलाकों की ओर फैल रहा है. इससे लोगों को अपने घरों के साथ मवेशियों की सुरक्षा की भी चिंता सता रही है.
हर साल बाढ़ में उठता है राहत और स्थायी समाधान का सवाल
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इस इलाके में हर वर्ष बाढ़ आती है और इसके साथ राहत को लेकर राजनीति भी शुरू हो जाती है. सबरी टोला की बुधिया देवी, दाहो सिंह, नरेश सिंह समेत अन्य ग्रामीणों ने कहा कि बाढ़ के कारण मजदूरी बंद हो जाती है और खेतों में पानी भरने से फसल बर्बाद हो जाती है.
ग्रामीणों का आरोप है कि हर साल बाढ़ के दौरान सत्ता पक्ष के नेता राहत दिलाने का आश्वासन देते हैं, जबकि विपक्षी नेता राहत और सुविधाओं की कमी को लेकर सरकार पर सवाल उठाते हैं. उनका कहना है कि राजनीतिक बयानबाजी के बीच बाढ़ प्रभावित लोगों की समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं हो सका है.
बाढ़ आश्रय स्थल की उपयोगिता पर भी सवाल
बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए 2008 के बाद क्षेत्र में बाढ़ आश्रय स्थलों का निर्माण कराया गया था. ग्रामीणों का आरोप है कि कई स्थानों पर आश्रय स्थल के लिए निचली जमीन का चयन किया गया, जिसके कारण बाढ़ के दौरान खुद आश्रय स्थल में पानी भर जाता है.
ग्रामीणों के अनुसार कुछ जगहों पर बाढ़ आश्रय स्थल तक पहुंचने के लिए भी पानी से होकर गुजरना पड़ता है. ऐसे में आपदा के समय जिन भवनों का इस्तेमाल लोगों को सुरक्षित स्थान देने के लिए होना चाहिए, उनकी उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं.
42 नावों और दो बोट से एसडीआरएफ की निगरानी
अंचलाधिकारी अंकेश कुमार ने बताया कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में कुल 42 नावों का परिचालन किया जा रहा है. प्रभावित इलाकों में मेडिकल टीम के माध्यम से लगातार स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करायी जा रही हैं.
उन्होंने बताया कि एसडीआरएफ की एक टीम दो बोट के साथ लगातार बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में तैनात है. इसके अलावा प्रत्येक बाढ़ प्रभावित पंचायत में 14 आपदा मित्रों को स्टैंडबाय में रखा गया है. जरूरत पड़ने पर उनकी सहायता ली जाएगी.
बढ़ते जलस्तर के बीच प्रशासन की तैयारी पर नजर
कोसी नदी का जलस्तर लगातार बढ़ने के बीच प्रशासन की ओर से नाव, स्वास्थ्य सेवा और एसडीआरएफ की तैनाती की जानकारी दी गयी है. वहीं प्रभावित परिवार राहत सामग्री और पशुचारे की उपलब्धता को लेकर अपनी मांग उठा रहे हैं. अब लोगों की नजर इस बात पर है कि जलस्तर बढ़ने की स्थिति में प्रशासन राहत और बचाव कार्य को किस तरह तेज करता है.
