मधेपुरा : दो वर्ष तक जन्म से दिव्यांग बच्ची का लालन-पालन कर शुक्रवार की देर रात बच्ची को मकई के खेत में फेंक दिये जाने के इस मामले ने मानवता को शर्मशार कर दिया है. बिहार के मधेपुरा में मुरलीगंज नगर पंचायत अंतर्गत रेलवे स्टेशन के दक्षिण पश्चिम की तरफ मकई के खेत में शुक्रवार को दो वर्षीया दिव्यांग बच्ची को लावारिस हालत में छोड़कर फरार होने के मामले ने लाचार बच्ची के परवरिश व कठोर बन चुके इंसानी रिश्तें की डोर को कमजोर साबित कर दिया है. बच्ची के रोने की आवाज ने पास से गुजर रहे युवाओं का ध्यान अपनी और खींचा. अंधेरे में आ रही आवाज की दिशा में जब युवक पहुंचे तो मकई के खेत में एक बच्ची को रोते हुए देखा. इसके बाद युवाओं ने सुझबुझ का परिचय देते हुए बच्ची को स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया.
दिव्यांगता व कुपोषण की शिकार है बच्ची
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में बच्ची को भर्ती कराने के बाद ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक डाॅ आलोक अमर ने स्वास्थ्य परीक्षण करने के बाद बताया कि बच्ची हाथ व पैर से दिव्यांग है. प्रथम दृष्टया में देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि बच्चे की उम्र दो वर्ष है. बच्चे की मिलने की जानकारी मुरलीगंज थाने को भी दी गयी है. डॉक्टर ने बताया कि बच्ची के प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें भोजन के रूप में दूध आदि दिया गया है. उन्होंने बताया कि बच्ची कुपोषण से भी पीड़ित है. इस आशय की सूचना बाल संरक्षण गृह मधेपुरा को दे दी गयी है. बच्ची को बाल संरक्षण गृह मधेपुरा के टीम पहुंचने के बाद उन्हें बच्ची को सुपुर्द कर दिया जायेगा.
स्थानीय लोगों ने पहचान से किया इन्कार
बच्ची के मकई खेत में मिलने की खबर स्थानीय इलाके में फैलने के बाद अस्पताल में लोगों की भीड़ लग गयी. किसी भी व्यक्ति द्वारा पहचान नहीं बतायी गयी है. इतना ही नहीं स्थानीय लोगों द्वारा बच्ची की तस्वीर सोशल मीडिया व व्हाट्सएप ग्रुप में वायरल भी की गयी है. जिससे की बच्ची के वास्तविक घरवालों की जानकारी मिल सके. कई लोगों ने बताया कि संभावना है कि ट्रेन के जरिये दूसरे जिले से आकर भी लाचारी में कोई बच्ची को छोड़ गये होंगे.
मां को ढूंढ़ रही है नजरें
अस्पताल के बेड पर कपड़े में लिपटी मासूम आने-जाने वाले सभी लोगों को एकटक निहारती रहती है. इस बीच जब कई लोगों के आने के बाद कोई पहचान का चेहरा नहीं देखने पर रोने लगती है. अस्पताल के कर्मी फिलवक्त बच्ची के माता-पिता बन देखभाल कर रहे है. मासूम बच्ची बार-बार टकटकी लगाये माता-पिता को ढूंढ़ रही है. दो वर्षीय बच्ची बोलने से लाचार होने की वजह से देखती रहती है. बच्ची की मासूमियत देखने वाले भी स्वंय को भावूक होने से नहीं रोक पाते है.
कहते हैं समाजशास्त्री
मनोविज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ अशोक कुमार ने कहा कि लोगों में सब्र का अभाव हो रहा है. यही कारण है कि एक तरफ बुजुर्ग माता-पिता को अकेले उनके हाल पर जीने के लिए छोड़ दिया जाता है. दूसरी तरफ महज दिव्यांगता के कारण बच्ची के परवरिश करने से कतराते हुए उसे जानवरों का चारा बनने के लिए खेत में छोड़ दिया जाता है. संयुक्त परिवार व रिश्तों की परिभाषा लोग भूल रहे है. एकल परिवार इस तरह की अमानवीय हालात उत्पन्न करा रही है.
