लाखों की डील, फर्जी स्कॉलर और बायोमेट्रिक में सेंध, ऐसे चलता है सॉल्वर गैंग का पूरा खेल

NEET UG Scam: मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी में सफलता पाने के लिए जहां लाखों छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं, वहीं कुछ लोग अवैध रास्तों से इस व्यवस्था को चुनौती देने में जुटे हैं. लखीसराय जिले के विभिन्न परीक्षा केंद्रों से नौ फर्जी परीक्षार्थियों की गिरफ्तारी के बाद सॉल्वर गैंग के संगठित नेटवर्क की चर्चा तेज हो गयी है. शुरुआती जांच और विशेषज्ञों की मानें तो इस पूरे खेल में बायोमेट्रिक सत्यापन, फर्जी पहचान और मोटी रकम के लेनदेन की अहम भूमिका होती है.

लखीसराय से राजीव मुरारी सिन्हा/राजेश कुमार की रिपोर्ट

NEET UG Scam: डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले लाखों छात्रों के बीच एक ऐसा काला कारोबार भी सक्रिय है, जो मेहनत नहीं बल्कि पैसे के दम पर मेडिकल कॉलेज का रास्ता खोजता है. लखीसराय में पकड़े गए नौ फर्जी परीक्षार्थियों के मामले ने नीट-यूजी परीक्षा में सक्रिय सॉल्वर गैंग के हाईटेक नेटवर्क की परतें खोल दी हैं.

डॉक्टर बनने का शॉर्टकट, लाखों में तय होती है डील

सूत्रों के अनुसार सॉल्वर गैंग परीक्षा से कई महीने पहले ऐसे अभ्यर्थियों की तलाश शुरू कर देता है जो किसी भी कीमत पर मेडिकल कॉलेज में दाखिला चाहते हैं. आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों या कमजोर तैयारी वाले छात्रों को निशाना बनाया जाता है. लाखों रुपये में सौदा तय होने के बाद गैंग पूरी रणनीति पर काम शुरू कर देता है.

मेधावी स्कॉलर्स को बनाया जाता है मोहरा

इस नेटवर्क के पास ऐसे प्रतिभाशाली छात्रों का डाटा रहता है जो पहले नीट जैसी कठिन परीक्षाओं में सफलता हासिल कर चुके होते हैं. इन्हें एक परीक्षा देने के बदले लाखों रुपये का लालच दिया जाता है. ऐसे स्कॉलर असली उम्मीदवार की जगह परीक्षा केंद्र तक पहुंचाए जाते हैं.

फोटो मर्फिंग और फर्जी पहचान का खेल

जांच में सामने आया है कि पहचान छिपाने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है. असली उम्मीदवार और सॉल्वर की तस्वीरों को डिजिटल सॉफ्टवेयर की मदद से इस तरह तैयार किया जाता है कि दोनों में समानता दिखाई दे. इसके आधार पर एडमिट कार्ड और अन्य पहचान दस्तावेजों में हेरफेर की कोशिश की जाती है.

बायोमेट्रिक सत्यापन सबसे बड़ी चुनौती

परीक्षा केंद्रों पर फिंगरप्रिंट और फेस वेरिफिकेशन को सुरक्षा की मजबूत कड़ी माना जाता है. हालांकि, जांच एजेंसियों का मानना है कि संगठित गिरोह इन प्रक्रियाओं को प्रभावित करने के लिए कई तरह के अवैध उपाय तलाशते रहते हैं. इसी कारण बायोमेट्रिक सत्यापन से जुड़े कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में रहती है.

एआई निगरानी के बावजूद बरकरार है खतरा

राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी और पुलिस प्रशासन लगातार सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं. एआई आधारित फेस रिकग्निशन, डिजिटल सत्यापन और कड़े बायोमेट्रिक प्रोटोकॉल के कारण हर वर्ष कई फर्जी अभ्यर्थी पकड़े जाते हैं. इसके बावजूद तकनीक के साथ अपराधियों के तरीके भी बदल रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के नेटवर्क केवल परीक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि ईमानदार छात्रों के भविष्य के लिए भी गंभीर खतरा हैं.

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By Pintu Pranav

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