लखीसराय. ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों से समृद्ध लखीसराय की धरती ने इतिहास का एक अनोखा पन्ना सामने रखा है. अशोकधाम मंदिर के समीप स्थित प्राचीन राहुगढ़ टीले से पाल वंश के शासक रामपाल के शासनकाल की करीब 900 साल पुरानी दुर्लभ प्रस्तर प्रतिमा मिली थी. प्रतिमा की पादपीठ पर उत्कीर्ण अभिलेख और उस पर बनी आकृतियां मध्यकालीन बिहार के सामाजिक जीवन, व्यवसाय और खान-पान की संस्कृति की दिलचस्प झलक पेश करती हैं.
कुबेर या जंभल जैसी दिखती है प्रतिमा, हाथों में हैं पारंपरिक मिठाइयां
ग्रे-काले पत्थर से बनी तोंदयुक्त पुरुष देवता की यह प्रतिमा ललितासन में विराजमान है. पहली नजर में इसका स्वरूप कुबेर या जंभल से मिलता-जुलता दिखाई देता है. हालांकि प्रतिमा के हाथों में मोदक के बजाय बिहार की पारंपरिक मिठाइयों से जुड़ी आकृतियां दिखाई देती हैं.
दाहिने हाथ में अर्धचंद्राकार वस्तु और बाएं हाथ में गोलाकार वस्तु उकेरी गयी है. विशेषज्ञों के अनुसार इन्हें 'चंद्रकला' और 'पेड़किया' यानी गुझिया से जोड़ा जाता है.
आसन पर उकेरे गये हलवाई के औजार
प्रतिमा की खासियत केवल हाथों में मौजूद वस्तुओं तक सीमित नहीं है. इसके आसन के मध्य भाग में हलवाई के औजार भी उकेरे गये हैं. इनमें छुरी, बेलन-चौकी और मिठाई बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला खांचा यानी सांचा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.
प्रतिमा पर बनी ये आकृतियां उस दौर में मिठाई बनाने और हलवाई के पेशे की मौजूदगी की ओर महत्वपूर्ण संकेत देती हैं.
हलवाई ने करायी थी प्रतिमा की स्थापना, अभिलेख से मिला संकेत
कोलकाता विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद डॉ. रजत सन्याल और प्रोफेसर अनिल कुमार के शोधपत्र के अनुसार, प्रतिमा की स्थापना किसी राजा या राजपरिवार के व्यक्ति ने नहीं, बल्कि एक हलवाई ने करायी थी.
प्रतिमा की चौकी पर गौड़ी लिपि में दो पंक्तियों का अभिलेख उत्कीर्ण है. शोधपत्र में इसका पाठ इस प्रकार दिया गया है:
"श्रीमद्रामपालदेवविजयसंवत 8 जेठ दिने 2... कंदूक देवधर सुत वामणमहीधर... महसोण"
1086-87 ईस्वी में समर्पित की गयी थी प्रतिमा
शोध के अनुसार अभिलेख में पाल सम्राट रामपाल के राज्याभिषेक के आठवें वर्ष का उल्लेख मिलता है. ज्येष्ठ माह के दूसरे दिन प्रतिमा को देयधर्म के रूप में समर्पित किए जाने की जानकारी सामने आती है. इसका समय लगभग मई 1086-87 ईस्वी माना गया है.
अभिलेख में महसोण यानी वर्तमान महसौना निवासी कंदुक, जिन्हें हलवाई के रूप में बताया गया है, का उल्लेख मिलता है. उनके पिता का नाम देवधर और पुत्र का नाम वामणमहीधर बताया गया है. महसौना गांव राहुगढ़ टीले से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.
अनधिकृत खुदाई के दौरान मिली थी प्रतिमा
बताया जाता है कि यह प्रतिमा कुछ वर्ष पहले राहुगढ़ टीले पर स्थानीय लोगों द्वारा की गयी अनधिकृत खुदाई के दौरान मिली थी. बाद में इसे अशोकधाम मंदिर परिसर में रखा गया. अब इस दुर्लभ प्रतिमा को लखीसराय संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है.
मध्यकालीन बिहार के व्यवसाय और खान-पान की संस्कृति का प्रमाण
विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्वी भारत के अभिलेखीय इतिहास में कंदुक यानी हलवाई वर्ग के किसी व्यक्ति द्वारा प्रतिमा स्थापित कराने का यह पहला और अनूठा प्रमाण माना जा रहा है. प्रतिमा तत्कालीन समाज में व्यवसाय और धार्मिक आस्था के बीच संबंध की ओर भी संकेत करती है.
प्रतिमा पर मिठाइयों और हलवाई के औजारों का अंकन यह बताता है कि उस समय स्थानीय खान-पान और पेशागत पहचान को धार्मिक कला में भी स्थान मिल सकता था. इस लिहाज से यह प्रतिमा मध्यकालीन बिहार के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
पेड़किया को जीआई टैग दिलाने की भी पहल
बिहार विरासत समिति की ओर से पेड़किया की ऐतिहासिकता, पारंपरिक निर्माण विधि और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए इसके भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग के लिए आवेदन की प्रक्रिया की जानकारी दी गयी है. इसका उद्देश्य इस विशिष्ट व्यंजन को कानूनी संरक्षण दिलाने के साथ इससे जुड़े स्थानीय कारीगरों को लाभ पहुंचाना है.
