सूर्यगढ़ा (लखीसराय) से राजेश गुप्ता की रिपोर्ट : लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा बाजार स्थित बड़ी दुर्गा मंदिर आज पूरे प्रखंड में आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन चुका है. मुंगेर-लखीसराय एनएच-80 किनारे स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर अपनी भव्यता, विशाल परिसर और धार्मिक परंपराओं के कारण दूर-दराज के श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. करीब 109 वर्षों से यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की परंपरा निभाई जा रही है. नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर भक्तिमय माहौल से पूरी तरह गुलजार हो उठता है.
महामारी से मुक्ति की आस्था से जुड़ा इतिहास
स्थानीय लोगों के अनुसार वर्षों पहले इस इलाके में बाढ़ और महामारी का बड़ा संकट था. लोग असमय मौत और बीमारियों से परेशान होकर गांव छोड़ने लगे थे. उसी समय माधो पांडेय ने मछलहट्टा क्षेत्र के पास माता रानी की पूजा शुरू की. बाद में पटेलपुर गांव के समीप स्थायी पूजा स्थल बनाया गया. लोगों की मान्यता है कि मां दुर्गा की पूजा शुरू होने के बाद क्षेत्र को महामारी से राहत मिली. तभी से माधो पांडेय परिवार यहां पूजा-पाठ कराता आ रहा है.
1917 से चली आ रही प्रतिमा स्थापना की परंपरा
बताया जाता है कि वर्ष 1917 से यहां प्रतिमा स्थापना की परंपरा लगातार जारी है. बड़ी दुर्गा मंदिर को सूर्यगढ़ा प्रखंड का सबसे पुराना और प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर माना जाता है. यहां सालों भर नियमित पूजा, संध्या आरती और अखंड दीप जलता रहता है. मंदिर का विशाल गर्भगृह और भव्य परिसर श्रद्धालुओं को विशेष रूप से आकर्षित करता है.करोड़ों की लागत से हुआ मंदिर का कायाकल्प
वर्ष 2013 में बड़ी दुर्गा मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष दिलीप कुमार अग्रवाल की देखरेख में मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य शुरू किया गया. मंदिर निर्माण पर लगभग पांच करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा गया था. वर्तमान में मंदिर का अधिकांश निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और मंदिर का स्वरूप बेहद आकर्षक और भव्य बन गया है.
नवरात्र में उमड़ती है भक्तों की भारी भीड़
शारदीय और बासंती नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना, दुर्गा सप्तशती पाठ और महाआरती का आयोजन होता है. बाहर से विद्वान ब्राह्मणों को पूजा के लिए बुलाया जाता है. महाअष्टमी के दिन यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. भक्तों की मान्यता है कि मां दुर्गा यहां आने वाले हर श्रद्धालु की मनोकामना पूरी करती हैं.मंदिर कोष से होते हैं विकास कार्य
मंदिर परिसर में बने छोटे-छोटे दुकानों से होने वाली आय मंदिर कोष में जमा की जाती है. इसी राशि से मंदिर के विकास कार्य संचालित होते हैं. इसके अलावा शादी-विवाह जैसे आयोजनों से भी मंदिर को आर्थिक सहयोग मिलता है. स्थानीय लोगों के सहयोग और गुप्त दान से यह मंदिर लगातार विकसित हो रहा है.
