मेची नदी पुल हादसे के 3 साल बाद RTI में बड़ा खुलासा: NHAI ने माना हुई थी जांच

किशनगंज जिले में मेची नदी पर निर्माणाधीन पुल के धंसने के तीन साल बाद आरटीआई से एक बड़ा खुलासा हुआ है. भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने जांच और मरम्मत की बात स्वीकार की है, लेकिन महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से मना कर दिया है. इस घटना ने भारत-नेपाल सीमा के लिए महत्वपूर्ण इस मार्ग की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

किशनगंज जिले के ठाकुरगंज-बहादुरगंज रेलखंड पर राष्ट्रीय राजमार्ग-327ई (NH-327E) पर स्थित मेची नदी के निर्माणाधीन पुल का एक पाया 23 जून 2023 को धंस गया था. पहली ही बरसात में हुई इस बड़ी संरचनात्मक विफलता ने पूरे सीमांचल में हड़कंप मचा दिया था. अब इस हादसे के करीब तीन वर्ष बाद सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत आए एक जवाब ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एनएचएआई ने यह तो स्वीकार किया है कि पुल की जांच और मरम्मत कराई गई, लेकिन इससे जुड़े किसी भी महत्वपूर्ण दस्तावेज को सार्वजनिक करने से मना कर दिया है.

भारत-नेपाल सीमा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है यह रूट

मेची नदी पर बना यह पुल सामरिक और आर्थिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है:

  • लाइफलाइन: यह मार्ग ठाकुरगंज, बहादुरगंज, गलगलिया और भारत-नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों को आपस में जोड़ता है.
  • आवागमन व व्यापार: इस मार्ग से रोजाना हजारों लोगों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर कृषि उपज, व्यापारिक सामग्री और आवश्यक वस्तुओं का परिवहन होता है. यही वजह थी कि इसके धंसने पर डिजाइन और तकनीकी निगरानी पर गंभीर सवाल उठे थे.

आरटीआई में खुली पोल: जांच और सुधारात्मक कार्य की बात स्वीकारी

हादसे के तीन साल बीतने पर जब आरटीआई के जरिए विभाग से जवाब मांगा गया, तो एनएचएआई ने अपने आधिकारिक पत्र में माना कि:

  1. तकनीकी जांच: हादसे के तुरंत बाद रियायतधारी कंपनी और स्वतंत्र इंजीनियरों की टीम ने पूरे मामले की गहन तकनीकी जांच की थी.
  2. लोड टेस्ट के बाद खुला पुल: तकनीकी समिति द्वारा दिए गए सुझावों के आधार पर पुल का सुधारात्मक (मरम्मत) कार्य पूरा किया गया. इसके बाद भार परीक्षण (लोड टेस्ट) और अन्य गुणवत्ता मानकों की जांच कर इसे यातायात के लिए दोबारा खोला गया.

रिपोर्ट से लेकर कार्रवाई के आदेश तक... सब छुपा गया विभाग

भले ही पुल पर आज यातायात सामान्य रूप से चल रहा हो, लेकिन एनएचएआई का रुख सूचना के अधिकार कानून को ठेंगा दिखाने वाला रहा. आरटीआई आवेदन के जरिए हादसे से जुड़े कई अहम प्रमाणित दस्तावेज मांगे गए थे, जिनमें शामिल थे:

  • जांच समिति का गठन आदेश और अंतिम जांच प्रतिवेदन (RTI Report).
  • दोषी अधिकारियों/अभियंताओं पर की गई निलंबन या अनुशासनात्मक कार्रवाई का आदेश.
  • संरचनात्मक सुरक्षा जांच रिपोर्ट, डिजाइन समीक्षा और कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र.

नहीं दी एक भी कॉपी: एनएचएआई ने इनमें से किसी भी दस्तावेज की प्रति आवेदक को उपलब्ध नहीं कराई. विभाग ने केवल एक संक्षिप्त लिखित जवाब देकर पल्ला झाड़ लिया कि सब कुछ ठीक कर दिया गया है.

बिना बजटीय मंजूरी के कैसे हुई करोड़ों की मरम्मत?

एनएचएआई के जवाब ने एक और बड़ा वित्तीय संशय पैदा कर दिया है. विभाग ने स्पष्ट किया है कि इस पुल की मरम्मत या सुधारात्मक कार्य के लिए अलग से कोई लागत अनुमान या वित्तीय स्वीकृति (फंड) जारी नहीं की गई थी.

निर्माण विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई सरकारी पुल बिना उद्घाटन के ही धंस जाता है, तो उसकी मरम्मत किस कांट्रैक्ट के तहत हुई, किस सक्षम अधिकारी ने इसकी तकनीकी स्वीकृति दी और इसका प्रशासनिक आदेश कहां है—इन सभी का रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए ताकि भविष्य की परियोजनाओं में ऐसी गलतियों को रोका जा सके.

क्या सूचना आयोग पहुंचेगा मामला?

अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि जब एनएचएआई खुद मान रहा है कि गड़बड़ी हुई थी और उसे सुधारा गया, तो फिर जांच रिपोर्ट और दोषियों पर हुई कार्रवाई के पन्नों को दबाया क्यों जा रहा है? करोड़ों रुपये की सार्वजनिक परियोजना में इस तरह की गोपनीयता तकनीकी जवाबदेही पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है. स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि यदि एनएचएआई इन दस्तावेजों को जल्द सामने नहीं लाता, तो इस मामले को राज्य/केंद्रीय सूचना आयोग (Information Commission) के समक्ष ले जाया जाएगा.


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लेखक के बारे में

बच्छराज प्रिंट माध्यम में 25 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 3 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. ठाकुरगंज (किशनगंज) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक कार्यों, शिक्षा, राजनीति व खेल में रुचि रखते हैं.

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