ठाकुरगंज (किशनगंज) से बच्छराज नखत की रिपोर्ट
Kishanganj News: मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसे लोकतंत्र के अहम कार्य को सफल बनाने वाले बीएलओ आज अपने ही मानदेय के लिए इंतजार करने को मजबूर हैं. घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करने और निर्वाचन आयोग के विशेष अभियान को सफल बनाने वाले किशनगंज जिले के करीब 225 बीएलओ एवं बीएलओ सुपरवाइजरों को एक वर्ष बाद भी उनका विशेष मानदेय नहीं मिल सका है.
जानकारी के अनुसार स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान के तहत कार्य करने वाले प्रत्येक बीएलओ और सुपरवाइजर को नियमित मानदेय से अलग 6 हजार रुपये की विशेष प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की गई थी. यह राशि अतिरिक्त श्रम और जिम्मेदारी के सम्मान के रूप में निर्धारित की गई थी. लेकिन कार्य पूरा होने के लगभग एक वर्ष बाद भी भुगतान लंबित है.
फाइलों में अटका 13.50 लाख रुपये
जिले में लगभग 225 शिक्षकों ने बीएलओ की जिम्मेदारी निभाई थी. प्रत्येक को 6 हजार रुपये की दर से भुगतान किया जाना है. इस हिसाब से करीब 13.50 लाख रुपये का मानदेय अब भी लंबित पड़ा हुआ है. शिक्षकों का कहना है कि उन्होंने निर्धारित समय के भीतर घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन, नए मतदाताओं का पंजीकरण और त्रुटियों के सुधार का काम पूरा किया था.
बीएलओ का कहना है कि चुनावी और पुनरीक्षण कार्य के दौरान छुट्टियों तथा विद्यालयी जिम्मेदारियों के बीच भी उन्हें निर्वाचन कार्य को प्राथमिकता देनी पड़ती है. बावजूद इसके भुगतान के मामले में लगातार देरी हो रही है.
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“यह केवल राशि नहीं, सम्मान का प्रश्न”
कई शिक्षकों का कहना है कि अन्य जिलों में विशेष मानदेय का भुगतान किया जा चुका है, जबकि किशनगंज के बीएलओ अब भी प्रतीक्षा कर रहे हैं. उनका मानना है कि मामला केवल 6 हजार रुपये का नहीं, बल्कि उनके श्रम और योगदान के सम्मान का है.
शिक्षकों का कहना है कि जब निर्वाचन कार्य की बात होती है तो उन्हें लोकतंत्र का सिपाही कहा जाता है, लेकिन भुगतान के समय उनकी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं देता.
आवंटन मिलते ही होगा भुगतान
इस मामले पर प्रखंड विकास पदाधिकारी अहरार अब्बाली ने बताया कि विशेष मानदेय के भुगतान के लिए आवश्यक राशि का आवंटन अब तक प्राप्त नहीं हुआ है. जैसे ही आवंटन मिलेगा, सभी पात्र बीएलओ और सुपरवाइजरों को भुगतान कर दिया जाएगा.
फिलहाल जिले के सैकड़ों बीएलओ की निगाहें सरकार और प्रशासन की ओर टिकी हैं. एक साल का इंतजार अब सवाल में बदल चुका है और लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले ये कर्मी अपनी मेहनत का हक मिलने की राह देख रहे हैं.
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