सीमांचल के किशनगंज नगर स्थित पार्श्व भवन में शुक्रवार को दिगंबर जैन परंपरा के विख्यात संत मुनि श्री अरिजीत सागर जी महाराज ने जैन धर्म के सबसे कठिन और कठोर व्रतों में शामिल 'केशलोचन' की विधि पूर्ण की. इस अलौकिक और वैराग्यपूर्ण दृश्य के साक्षी बनने के लिए मुनिश्री के शिष्यों के साथ-साथ दिगंबर जैन समाज के बड़ी संख्या में श्रद्धालु पार्श्व भवन पहुंचे. केशलोचन संपन्न होने के बाद मुनि श्री ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्रद्धालुओं को इस कठिन तपस्या के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व से अवगत कराया और बताया कि यह क्रिया मुनि जीवन में स्वाधीनता, तितिक्षा (सहनशीलता) और अहिंसा महाव्रत का जीवंत प्रमाण है.
क्या है 'केशलोचन'? साल में चार बार हाथों से बाल उखाड़ते हैं मुनि
मुनिश्री ने इस कठोर साधना की प्रक्रिया और परंपरा को स्पष्ट किया:
- तीन-तीन माह का अंतराल: दिगंबर जैन संप्रदाय में दीक्षित मुनि वर्ष में चार बार, यानी प्रत्येक तीन महीने के अंतराल पर अपने सिर, दाढ़ी और मूंछ के बालों को बिना किसी औजार या कैंची के, स्वयं अपने हाथों से उखाड़ते हैं.
- कठिनतम तपश्चर्या: शारीरिक दृष्टि से यह क्रिया देखने में जितनी असहनीय और कष्टकारी प्रतीत होती है, साधना की दृष्टि से इसका आध्यात्मिक फल उतना ही गहरा और मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करने वाला है.
केशलोचन का आध्यात्मिक महत्व एक नज़र में
| आध्यात्मिक आयाम (Spiritual Aspect) | धार्मिक मान्यता व उद्देश्य (Significance & Principles) |
| अनुष्ठान का नाम | केशलोचन (हाथों से केश उखाड़ने की वैदिक/जैन परंपरा) |
| अवधि / चक्र | वर्ष में 4 बार (प्रत्येक 3-3 माह के अंतराल पर) |
| मूल दर्शन | अयाचक वृत्ति, स्वावलंबन एवं शरीर के प्रति आसक्ति (ममत्व) का त्याग |
| जीव दया व अहिंसा | उस्तरा/ब्लेड न चलाकर बालों में रहने वाले सूक्ष्म जीवों की रक्षा करना |
| साधना का स्तर | परीषह जय (कष्ट सहने की असीम क्षमता), वैराग्य व आत्म-नियंत्रण |
| स्थल | स्थानीय पार्श्व भवन, किशनगंज (बिहार) |
स्वाधीनता और अयाचक वृत्ति: 'प्रभु व गुरु के अलावा किसी के आगे नहीं झुकता शीश'
मुनि श्री अरिजीत सागर जी महाराज ने केशलोचन के दार्शनिक पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला:
- सिंहवृत्ति के धारक: दिगंबर मुनि सिंह के समान निर्भीक और स्वाधीन होते हैं. वे देवाधिदेव प्रभु और अपने दीक्षा गुरु के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति या सांसारिक सत्ता के समक्ष अपना मस्तक नहीं झुकाते.
- अयाचक भाव की रक्षा: यदि मुनि बाल कटवाने के लिए किसी नाई (हजाम) का सहारा लें, तो उन्हें सिर झुकाना पड़ेगा और याचना करनी होगी कि 'मेरे लिए नाई बुलाओ'. अपने हाथों से केशलोचन कर वे किसी पर आश्रित नहीं रहते और उनकी अयाचक व स्वावलंबी वृत्ति अक्षुण्ण बनी रहती है.
शरीर से ममत्व का त्याग और सूक्ष्म जीवों पर दया
केशलोचन के पीछे परम अहिंसा और देहाध्यास से मुक्ति का भाव छिपा है:
- अहिंसा धर्म का पालन: मुनिश्री ने बताया कि उस्तरे या आधुनिक ट्रिमर के प्रयोग से सिर की त्वचा पर मौजूद सूक्ष्म जूं या लीख जैसे अदृश्य जीवों का घात (हिंसा) होने की आशंका रहती है. जैन धर्म में अहिंसा की सूक्ष्मता का विशेष ध्यान रखा जाता है, इसलिए उस्तरे का पूर्ण त्याग कर अत्यंत सतर्कता से एक-एक बाल उखाड़ा जाता है.
- वैराग्य की पराकाष्ठा: यह अनुष्ठान इस बात का स्मरण कराता है कि यह नश्वर देह केवल साधना का माध्यम है, आसक्ति का नहीं. असहनीय शारीरिक वेदना को समभाव से सहने की यही क्षमता मुनि को कर्म बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर अग्रसर करती है.
