फर्जी डिजिटल चालान ने किया करोड़ों की जालसाजी का खुलासा

फर्जी डिजिटल चालान ने किया करोड़ों की जालसाजी का खुलासा

सीमावर्ती इलाके में सक्रिय है समानांतर खनन अर्थव्यवस्था

ठाकुरगंज. गलगलिया चेकपोस्ट पर पकड़े गए एक हाइवा ने जो कहानी सामने रखी है, वह किसी एक वाहन या एक चालक तक सीमित नहीं है. यह घटना उस छिपे हुए आर्थिक तंत्र की परत खोलती है, जो अवैध खनन, फर्जी दस्तावेज व कमजोर निगरानी के सहारे फल-फूल रहा है. यह अब केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था, प्रशासनिक ढांचे व तकनीकी सिस्टम की परीक्षा बन चुका है.

अवैध खनन : समानांतर अर्थव्यवस्था का उदय

बताते चले सीमावर्ती इलाके में अवैध खनन अब छिटपुट गतिविधि नहीं रहा. यह एक समानांतर अर्थव्यवस्था का रूप ले चुका है. अवैध खनन के जरिये खदानों से बिना अनुमति खनिज निकासी, कम रॉयल्टी दिखाकर अधिक माल की ढुलाई व नकली चालान के सहारे परिवहन. इस पूरी प्रक्रिया में हर स्तर पर पैसा बनता है. खनन से लेकर ट्रांसपोर्ट व डिलीवरी तक. विशेषज्ञों का मानना है कि यह नेटवर्क स्थानीय बाजार को भी प्रभावित करता है, क्योंकि अवैध खनिज सस्ते में उपलब्ध हो जाते हैं.

कैसे बनता है कमाई का गणित

बताते चले यदि एक हाइवा की क्षमता 20 टन है तो उस हाइवा में ओवरलोडिंग के साथ ढुलाई 30–35 टन, इस तरह हाईवा में बचत प्रति टन औसत कीमत 500–800 की होती है. पूरे हाइवा में एक ट्रिप में अवैध कमाई 5,000 से 15,000 तक की होती है. एक दिन में एक हाइवा तीन ट्रिप ढुलाई करता हो तो समझा जा सकता है कि एक दिन में एक हाइवा 15 हजार से 45 हजार तक की अतिरिक्त कमाई करता है. इस धंधे में 10–15 गाड़ियां सक्रिय रहती है. इस प्रकार एक दिन का संभावित अवैध कारोबार पांच लाख से अधिक का हो जाता है. यही आंकड़ा डेढ़ करोड़ तक पहुचं जाता है.

डिजिटल चालान में गड़बड़ी का पैटर्न

जानकार बताते है कि जांच में सामने आने वाले सामान्य पैटर्न है कि एक ही चालान नंबर का बार-बार उपयोग ऐसे काम में होता है. वहीं क्यूआर कोड स्कैन करने पर डेटा मिसमैच नहीं होगा. ऐसे चालान में तारीख व समय में हेरफेर तो रहता ही है. खदान व गंतव्य में भी अंतर साफ़ दिखता है. कहा जा सकता है कि यह पूरी तरह व्यवस्थित डिजिटल फ्रॉड है.

बताते चले अवैध खनन नेटवर्क चार स्तरों पर काम करता है, इसमें पहला खनन स्तर पर होता है. यह अवैध खुदाई को प्रोत्साहन करता है. वहीं दूसरा स्तर लॉजिस्टिक स्तर पर जो ट्रांसपोर्ट व लोडिंग की सेडिंग करता है. तीसरा स्तर डॉक्यूमेंट सेटिंग का है, जो फर्जी चालान बनाता है. अंतिम स्तर डिलीवरी का है जो खरीदार से सप्लाई तक सेटिंग करता है. इस पूरे मामले में हर स्तर पर अलग-अलग लोग, लेकिन उद्देश्य एक ज्यादा मुनाफा कमाना.

चालाना का विरिफिकेशन सिस्टम इसकी कमजोर कड़ी

चालान वेरिफिकेशन सिस्टम मजबूत नहीं होना बताया जाता है. वहीं चेकपोस्ट पर तकनीकी संसाधन सीमित रहना भी अवैध धंधे को प्रोत्साहन देता है. डेटा का रियल-टाइम मिलान नहीं होना, इस मामले की सबसे कमजोर कड़ी होता है. यह मामला साफ करता है कि अवैध खनन अब छोटा अपराध नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक नेटवर्क बन चुका है, जिसमें तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है.

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By AWADHESH KUMAR

AWADHESH KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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