ठाकुरगंज के प्रतिनिधि के अनुसार
देश में परिवहन अवसंरचना के तेजी से विस्तार के बीच सीमांचल क्षेत्र भी विकास की नई उम्मीदों से उत्साहित है. एक ओर गोरखपुर-सिलीगुड़ी ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे के निर्माण की तैयारी चल रही है, वहीं दूसरी ओर दिल्ली-वाराणसी-सिलीगुड़ी हाई स्पीड रेल कॉरिडोर की घोषणा ने सीमांचल के भविष्य को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दिया है. जानकारों का मानना है कि सड़क और रेल कनेक्टिविटी की ये दोनों परियोजनाएं सीमांचल की आर्थिक, सामाजिक और औद्योगिक तस्वीर तो बदलेगी ही बल्कि पूर्वोत्तर भारत का दिल्ली से सम्पर्क और नजदीक करेगी.दिल्ली से सिलीगुड़ी तक बनेगा हाई-स्पीड कनेक्टिविटी कॉरिडोर
देश की राजधानी दिल्ली को उत्तर बंगाल और पूर्वोत्तर से जोड़ने के लिए सड़कों का एक विशाल नेटवर्क तैयार किया जा रहा है. दिल्ली से आगरा (165 किमी यमुना एक्सप्रेस-वे), आगरा से लखनऊ (302 किमी एक्सप्रेस-वे) और लखनऊ से गोरखपुर (289 किमी हाई-स्पीड सड़क) तक पहले से ही विश्वस्तरीय कनेक्टिविटी चालू है. इसके आगे अब 520 किलोमीटर लंबा गोरखपुर-सिलीगुड़ी ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे बनाया जा रहा है, जो सीधे उत्तर बिहार के रास्ते ठाकुरगंज के करीब से गुजरते हुए सिलीगुड़ी में मिलेगा. इसके बाद दिल्ली से सिलीगुड़ी तक का सफर महज कुछ घंटों का रह जाएगा. इसके समानांतर दिल्ली-वाराणसी-सिलीगुड़ी हाई स्पीड रेल कॉरिडोर की अवधारणा पूर्वी भारत को देश की राजधानी से तेज रेल संपर्क प्रदान कर सकती है. इससे सीमांचल देश के सबसे आधुनिक परिवहन गलियारों में शामिल हो सकता है.
सीमांचल को मिल सकता है नया रेल कॉरिडोर
वर्तमान में पटना से न्यू जलपाईगुड़ी (एनजेपी) पहुंचने का प्रमुख रेल मार्ग पटना-बरौनी-कटिहार-किशनगंज होकर गुजरता है. इस मार्ग की कुल दूरी लगभग 495 किलोमीटर मानी जाती है. वहीं दूसरा मार्ग पटना-समस्तीपुर-दरभंगा-सरायगढ़-फारबिसगंज-अररिया-ठाकुरगंज-गलगलिया-एनजेपी होकर जाता है, जिसकी अनुमानित दूरी लगभग 448 किलोमीटर बैठती है. यानी यह मार्ग वर्तमान मुख्य रूट से लगभग 47 किलोमीटर छोटा है. वही यदि प्रस्तावित फारबिसगंज-लक्ष्मीपुर-ठाकुरगंज रेललाइन का निर्माण होता है तो यह दूरी और कम हो सकती है.
सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो सकता है नया कॉरिडोर
वर्तमान में पटना-बरौनी-कटिहार-किशनगंज-न्यू जलपाईगुड़ी रेलमार्ग का एक बड़ा हिस्सा भारत-बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय सीमा के काफी निकट होकर गुजरता है. विशेष रूप से किशनगंज के बाद उत्तर बंगाल की ओर बढ़ने पर रेलवे लाइन कई स्थानों पर सीमावर्ती क्षेत्र से सटी हुई है. इसके विपरीत पटना-समस्तीपुर-दरभंगा-सरायगढ़-फारबिसगंज-अररिया-ठाकुरगंज-न्यू जलपाईगुड़ी रेलमार्ग बांग्लादेश सीमा से अपेक्षाकृत काफी दूर होकर गुजरता है. ऐसे में भविष्य में यदि इस कॉरिडोर का उन्नयन किया जाता है या इसे किसी हाई-स्पीड अथवा रणनीतिक रेल परियोजना से जोड़ा जाता है तो यह न केवल दूरी कम करने में सहायक हो सकता है, बल्कि सुरक्षा, परिचालन स्थिरता और वैकल्पिक संपर्क मार्ग के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. रेलवे विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी संवेदनशील “चिकन नेक ” क्षेत्र में एक से अधिक मजबूत रेल कॉरिडोर होना राष्ट्रीय दृष्टि से भी लाभकारी माना जाता है.
विकास की नई उम्मीद
सीमांचल लंबे समय से बेहतर सड़क और रेल संपर्क की मांग करता रहा है. गोरखपुर-सिलीगुड़ी एक्सप्रेस-वे, दिल्ली-वाराणसी-सिलीगुड़ी हाई स्पीड रेल कॉरिडोर तथा फारबिसगंज-लक्ष्मीपुर-ठाकुरगंज रेललाइन जैसी परियोजनाएं यदि धरातल पर उतरती हैं तो आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र उत्तर बिहार और उत्तर बंगाल के बीच एक महत्वपूर्ण आर्थिक और परिवहन केंद्र के रूप में उभर सकता है. फिलहाल इन परियोजनाओं को लेकर सीमांचल में उत्साह और उम्मीद का माहौल है.
