तो क्या मकई की खुशबू खींच लाती है भारतीय क्षेत्र में गजराज को
दिघलबैंक : भारत-नेपाल के सीमावर्ती दिघलबैंक प्रखंड में गजराज का उत्पात कोई नया नहीं है. बीते कई सालों से मकई की फसल के समय इन हाथियों के झुंड के लगातार आगमन से ग्रामीण दहशत में है. वर्ष 2016 में इसी तरह हाथियों के एक झुंड ने एक व्यक्ति की जान भी ले ली थी, अब […]
दिघलबैंक : भारत-नेपाल के सीमावर्ती दिघलबैंक प्रखंड में गजराज का उत्पात कोई नया नहीं है. बीते कई सालों से मकई की फसल के समय इन हाथियों के झुंड के लगातार आगमन से ग्रामीण दहशत में है. वर्ष 2016 में इसी तरह हाथियों के एक झुंड ने एक व्यक्ति की जान भी ले ली थी, अब जबकि फिर से मकई की फसल खेतों में लहलहा रही है, तो गजराज का आगमन एक बार फिर से शुरू है. दिघलबैंक प्रखंड में इस साल अब तक का यह चौथा मामला है,
जिसमें इन मतवाले हाथियों ने खेतों की फसलों को बुरी तरह से तहस-नहस कर दिया और लोग काफी भयभीत है. स्थानीय लोगों की मानें, तो आने वाले कुछ समय में इन हाथियों का कोहराम जारी रहेगा और लोग अभी से बदहवास हो रहे हैं, हालांकि केवल सीमा के गांव पर ही इन जंगली हाथियों का खौफ नहीं है. बल्कि काफी भीतर तक ये चले आते है और जो भी सामने आता है. बीते साल सीमा से करीब 20 किलोमीटर भीतर बीवीगंज और तालगाछ तक हाथियों का आतंक देखा गया, जबकि गंधर्वडांगा सतमेढ़ी इलाके में भी हाथियों के झुंड ने जम कर उत्पात मचाया था. लोगों की माने तो नेपाल और पश्चिम बंगाल में बचे हुए शेष जंगलों से भटककर ये हाथी मकई के मौसम में इधर चले आते हैं
फ़िलहाल नेपाल के पूर्वी सीमा बसे डोरिया, धनतोला सहित सीमा के समीप बसे गांव और बस्ती के लोगों की रातों की नींद इन हाथियों ने उड़ा दी है.
