दिघलबैंक : भारत-नेपाल सीमा पर बसे दिघलबैंक प्रखंड के लाखों की आबादी सजा-ए-काला पानी को अपनी नियति मान कर अपना जीवन जी रहें है, क्योंकि यहां के लोगों को अभी भी शुद्ध पेयजल मिलने का इंतजार है. मात्र 10 से 15 फीट की गहराई पर भू-जल तो उपलब्ध है, लेकिन यह पूर्ण रूप से प्रदूषित है. जानकारों की माने आवश्यकता से कई गुणा अधिक लौह तत्व की मात्रा तथा आर्सेनिक की मात्रा ने यहां के पानी को जहरीला बना दिया है,
जिस कारण से लोग कई प्रकार के बीमारियों से लोग पीड़ित हो रहे है, जिसमें चर्मरोग, कब्ज, लीबर, एसनोफिलिया, दांत के रोग शामिल हैं. मीठा जहर के रूप में इस पानी के सेवन से लोग असमय काल के गाल में भी समा रहें हैं. ऐसा नहीं है कि शुद्ध पानी उपलब्ध कराने के सरकार की तरफ से कई बार योजनाएं बनी पैसे भी खर्च हुए, लेकिन लोगों को पीने योग्य पानी नसीब नहीं हुआ. तुलसिया पुराना बाजार में कई दशक पूर्व लगाये जल संयंत्र और प्रखंड मुख्यालय में बने जल मीनार इसकी एक बानगी भर है. करोड़ों खर्च के बाद भी दिघलबैंक वासियों को पीने का पानी आज तक मयस्सर न हो सका.
हां, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जब 2010 में विकास यात्रा के क्रम में जब तुलसिया आगमन हुआ था तब विभाग और प्रशासन ने इस जल शुद्धिकरण संयंत्र परिसर के रंग-रोगन में लाखों रुपये जरूर खर्च किये थे. कहीं सीएम साहब की नजर इस पर न पड़ जाये अब तो शायद इस पूरे संयत्र ने कचरे का रूप धारण कर लिया है और ठीक वैसी ही स्थिति दिघलबैंक प्रखंड मुख्यालय में कई वर्ष पूर्व बने जल मीनार का है जो यहां के वाशिंदे को मुंह चिढ़ा रहा है इसके अलावे दिघलबैंक बाजार, धनतोला, गंधर्वडांगा, सिंघिमारी, तालगाछ, फुटानीगंज, पदमपुर, इकड़ा, ताराबाड़ी सहित प्रखंड के अधिकांश इलाकों में जल शुद्धिकरण के लिए कोई योजना ही जमीन पर नहीं उतर सकी. दिघलबैंक काला पानी के श्राप से आखिर कब मुक्त होगा?
